Automobile Desk: भारतीय सेना देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए माइनस डिग्री वाले बर्फीले पहाड़ों से लेकर तपते रेगिस्तान और घने जंगलों तक तैनात रहती है। ऐसे दुर्गम इलाकों में केवल जांबाज जवानों का होना ही काफी नहीं है, बल्कि उनके पास ऐसे साधनों का होना भी बेहद जरूरी है जो हर विषम परिस्थिति में उनका साथ दे सकें। यही वजह है कि सेना में इस्तेमाल होने वाले वाहनों को आम नागरिक गाड़ियों की तुलना में पूरी तरह अलग और बेहद मजबूत बनाया जाता है। देखने में भले ही इनमें से कुछ गाड़ियां सड़क पर चलने वाली आम SUVs जैसी लगें, लेकिन इनके अंदर का इंजीनियरिंग सेटअप और फीचर्स पूरी तरह सैन्य जरूरतों के हिसाब से री-डिजाइन किए जाते हैं।
क्या सेना भी चलाती है साधारण गाड़ियां?
भारतीय सेना के काफिले में कई ऐसे वाहन शामिल हैं जिनके सिविलियन मॉडल आम शोरूम में बिकते हैं। इनमें महिंद्रा स्कॉर्पियो, टाटा सफारी, टोयोटा हाइलक्स और ऐतिहासिक मारुति जिप्सी जैसे नाम प्रमुख हैं। हालांकि, सेना को सौंपे जाने से पहले इन गाड़ियों में बड़े पैमाने पर बदलाव (Customization) किए जाते हैं। इन बदलावों का मुख्य मकसद वाहन की सहनशक्ति, क्षमता और विषम मौसम में प्रदर्शन को कई गुना बढ़ाना होता है।
दुर्गम रास्तों के लिए 4×4 ऑल-व्हील ड्राइव
सामान्य गाड़ियां टू-व्हील ड्राइव तकनीक पर चलती हैं, लेकिन सैन्य वाहनों में 4×4 (फोर-बाय-फोर) ड्राइव सिस्टम अनिवार्य रूप से दिया जाता है। पहाड़ों की बर्फ, रेगिस्तान की धंसने वाली रेत और बारिश के बाद बने गहरे कीचड़ में यह तकनीक गाड़ी के चारों पहियों को बराबर पावर देती है। इससे वाहन फिसलने या फंसने के बजाय जमीन पर मजबूत पकड़ बनाकर आसानी से आगे बढ़ जाता है।
खास मिलिट्री ग्रीन शेड और कैमॉफ्लाज design
सेना की गाड़ियों पर दिखने वाला खास हरा या ऑलिव ग्रीन रंग सिर्फ पहचान के लिए नहीं होता। यह कलर पैलेट युद्ध क्षेत्र या गश्त के दौरान गाड़ी को आसपास के पेड़-पौधों और प्राकृतिक माहौल में छुपाने (Camouflage) में मदद करता है। इसके अलावा, इनमें आम कारों की तरह चमकने वाले क्रोम या चमकीले पेंट का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं किया जाता ताकि दुश्मनों की नजर इन पर तुरंत न पड़े।
वेपन माउंट्स और स्पेशल स्टोरेज स्पेस
एक आम कार की डिग्गी में केवल ट्रैवल बैग्स रखे जाते हैं, जबकि मिलिट्री व्हीकल्स का इंटीरियर लेआउट पूरी तरह से सामरिक (Tactical) जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार होता है। इनमें असॉल्ट राइफल्स, वायरलेस संचार उपकरण, अतिरिक्त ईंधन के डिब्बे और मिशन से जुड़े भारी सामान को सुरक्षित लॉक करने के लिए अलग से ब्रैकेट और होल्डर बने होते हैं।
सुरक्षा के लिए बुलेटप्रूफ आर्मरिंग
सेना की हर गाड़ी बुलेटप्रूफ नहीं होती, लेकिन संवेदनशील और कॉम्बैट जोन में तैनात वाहनों में स्पेशल आर्मर प्लेटिंग की जाती है। इन गाड़ियों के ग्लास और बॉडी पैनल इतने मजबूत बनाए जाते हैं कि वे छोटे हथियारों की गोलीबारी और लैंडमाइन के झटकों को झेल सकें। इससे खतरनाक परिस्थितियों के दौरान अंदर बैठे जवानों को अतिरिक्त सुरक्षा कवर मिलता है।
हैवी-ड्यूटी टोइंग और रिकवरी हुक्स
सैन्य ऑपरेशन्स के दौरान कई बार गाड़ियां फंस जाती हैं या फिर भारी तोपों और उपकरणों को खींचना पड़ता है। इसके लिए सेना के वाहनों में हैवी-ड्यूटी टो हुक्स और मजबूत चेसिस दी जाती है। इनकी मदद से ये गाड़ियां खुद तो निकलती ही हैं, साथ ही काफिले के दूसरे भारी वाहनों को भी आसानी से खींचकर बाहर निकाल सकती हैं।
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