पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने आईएएस अधिकारी प्रदीप कुमार की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को नोटिस जारी किया है। अदालत ने जांच एजेंसी से आरोपी अधिकारी को गिरफ्तारी के लिखित आधार न देने के आरोपों पर जवाब मांगा है।
चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने आईएएस अधिकारी प्रदीप कुमार की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने जांच एजेंसी से स्पष्टीकरण मांगा है कि आरोपी को हिरासत में लेते समय गिरफ्तारी के ठोस कारण लिखित रूप में क्यों उपलब्ध नहीं कराए गए। आईएएस अधिकारी ने अपनी गिरफ्तारी, पुलिस रिमांड और न्यायिक हिरासत की वैधता को चुनौती देते हुए अदालत से तत्काल रिहाई की गुहार लगाई है। इस मामले में कोर्ट ने अब अगली सुनवाई के लिए 15 सितंबर की तारीख मुकर्रर की है।
गबन मामले में हुई कार्रवाई
यह पूरा विवाद सरकारी विभागों के बैंक खातों से शासकीय धन के अनधिकृत हस्तांतरण और गबन से जुड़ा हुआ है। इस मामले में सबसे पहले हरियाणा भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने आईडीएफसी फर्स्ट बैंक खातों में हुई वित्तीय अनियमितताओं को लेकर 23 फरवरी 2026 को एक प्राथमिकी दर्ज की थी। इसके बाद मामले की गंभीरता को देखते हुए 8 अप्रैल 2026 को इसकी पूरी जांच सीबीआई के सुपुर्द कर दी गई थी। केंद्रीय एजेंसी ने इसके बाद भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत नया मुकदमा दर्ज कर अपनी तफ्तीश शुरू की थी।
गिरफ्तारी के समय में विसंगति
याचिकाकर्ता का आरोप है कि जांच में पूरा सहयोग करने के बावजूद उन्हें 30 जून 2026 को दोपहर करीब 2:50 बजे नरवाना टोल प्लाजा से हिरासत में ले लिया गया। याचिका में दावा किया गया है कि सीबीआई के आधिकारिक दस्तावेजों में गिरफ्तारी का समय अलग-अलग दर्ज है। आरोपी की पत्नी को भेजे गए नोटिस में समय शाम 4:25 बजे लिखा है, जबकि गिरफ्तारी मेमो में इसे शाम 6:25 बजे दर्शाया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार यह विरोधाभास साबित करता है कि वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए बिना उन्हें कई घंटों तक अवैध हिरासत में रखा गया था।
पंचकूला अदालत का रिमांड आदेश
आरोपी के वकीलों ने अदालत को बताया कि पंचकूला की विशेष अदालत में रिमांड पर सुनवाई के दौरान भी गिरफ्तारी के लिखित आधार नहीं दिए गए थे। बचाव पक्ष की कड़ी आपत्ति के बाद वकीलों को जो दस्तावेज सौंपे गए, उस पर याचिकाकर्ता के हस्ताक्षर तक मौजूद नहीं थे। इसके बावजूद निचली अदालत ने समय की विसंगति को महज एक टाइपिंग की गलती मानते हुए पुलिस रिमांड को मंजूरी दे दी थी। इसके बाद 2 जुलाई 2026 को आरोपी अधिकारी को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया था।
संवैधानिक अधिकारों के हनन का दावा
उच्च न्यायालय में दाखिल याचिका में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया गया है। इसमें कहा गया है कि किसी भी नागरिक को उसकी गिरफ्तारी के लिखित कारण न बताना उसके संवैधानिक और मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने 30 जून की गिरफ्तारी और उसके बाद की सभी अदालती कार्यवाहियों को पूरी तरह निरस्त करने की मांग की है। हाई कोर्ट ने अब इन सभी गंभीर बिंदुओं पर सीबीआई से विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है।

