दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने पुलिस जांच की निष्पक्षता को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि एक ही व्यक्ति का शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी (IO) होना प्राकृतिक न्याय और निष्पक्ष सुनवाई के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है। अदालत ने इस आधार पर तिमारपुर की पार्षद प्रोमिला गुप्ता के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (FIR) और उससे जुड़ी सभी कानूनी कार्यवाहियों को रद्द करने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति प्रतीक जालान की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि आपराधिक जांच में निष्पक्षता बेहद जरूरी है। शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी की भूमिका एक ही व्यक्ति को सौंपे जाने से जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।
शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी की भूमिका अलग होना जरूरी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और निष्पक्ष ट्रायल के महत्व को रेखांकित किया। अदालत के अनुसार, आपराधिक मामले में जांच करने वाले अधिकारी की भूमिका निष्पक्ष होनी चाहिए। यदि वही व्यक्ति शिकायतकर्ता भी है और जांच की जिम्मेदारी भी उसी के पास है, तो निष्पक्ष जांच की मूल भावना प्रभावित हो सकती है। अदालत ने इसी कानूनी आधार पर तिमारपुर पार्षद प्रोमिला गुप्ता के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को निरस्त करने का आदेश दिया। इसके साथ ही इस FIR से संबंधित सभी कानूनी कार्यवाहियां भी रद्द कर दी गई हैं।
29 नवंबर 2022 को दर्ज हुई थी FIR
याचिका में दिल्ली संपत्ति विरूपण निवारण अधिनियम, 2007 की धारा 3 के तहत तिमारपुर थाने में 29 नवंबर 2022 को दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने की मांग की गई थी। पार्षद की ओर से अदालत में दलील दी गई कि मामले की जांच की प्रक्रिया में ही गंभीर कानूनी खामी थी, क्योंकि शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी की जिम्मेदारी एक ही पुलिसकर्मी को दी गई थी।
एक ही अधिकारी शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता दुष्यंत नायक ने अदालत को बताया कि इस मामले में सब-इंस्पेक्टर सुरेंद्र सिंह शिकायतकर्ता होने के साथ-साथ जांच अधिकारी भी थे। प्राथमिकी और आरोपपत्र में भी यही स्थिति सामने आई है। याचिकाकर्ता के अनुसार, जांच की यह व्यवस्था निष्पक्षता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं थी। एक ही अधिकारी द्वारा शिकायत दर्ज कराने और उसी मामले की जांच करने से पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित होती है।
मजिस्ट्रेट के संज्ञान लेने से दूर नहीं होगी खामी
हाईकोर्ट ने कहा कि जांच के स्तर पर मौजूद ऐसी बुनियादी खामी को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि मजिस्ट्रेट की अदालत ने मामले का संज्ञान ले लिया था। शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी की भूमिकाओं में निष्पक्षता बनाए रखना जरूरी है।
पूर्व के मामलों का दिया हवाला
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि दिल्ली हाईकोर्ट पहले भी ऐसे मामलों में प्राथमिकी रद्द कर चुका है। इस संबंध में अदालत का ध्यान ‘प्रेरणा बनाम राज्य’ और ‘अमित कुमार बनाम दिल्ली सरकार’ के फैसलों की ओर दिलाया गया। अधिवक्ता के मुताबिक, ये दोनों मामले भी दिल्ली संपत्ति विरूपण निवारण अधिनियम की धारा 3 के तहत दर्ज प्राथमिकी से संबंधित थे। इन फैसलों के आधार पर दलील दी गई कि शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी की भूमिका एक ही व्यक्ति को सौंपना जांच की निष्पक्षता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।
मजिस्ट्रेट के संज्ञान लेने की दलील नहीं मानी
सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त लोक अभियोजक ने पुलिस अधिकारी से मिली जानकारी के आधार पर स्वीकार किया कि इस मामले की जांच शिकायतकर्ता ने ही की थी। हालांकि, राज्य सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि मजिस्ट्रेट की अदालत पहले ही अपराध का संज्ञान ले चुकी है। हाईकोर्ट ने इस दलील को प्राथमिकी रद्द करने से इनकार करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना।
यह न्याय के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ
अदालत ने कहा कि पूर्व के फैसलों के अनुसार, शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी का एक ही व्यक्ति होना प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों के स्तर पर जांच को दोषपूर्ण बनाता है। पीठ ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट की अदालत ने इस महत्वपूर्ण पहलू पर विचार किए बिना अपराध का संज्ञान लिया था। ऐसे में केवल इस आधार पर याचिकाकर्ता को दोषपूर्ण जांच के आधार पर आपराधिक मुकदमे का सामना करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
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