हेमंत शर्मा, इंदौर। सनातन संस्कृति, वेदों की दिव्यता और भारतीय संस्कारों की महिमा को इंदौर के सात वर्षीय बालक अनघ चित्तौड़ा ने एक बार फिर पूरी दुनिया के सामने स्थापित कर दिया है। छोटी-सी उम्र में जिस आत्मविश्वास, स्पष्ट उच्चारण और अद्भुत स्मरण शक्ति के साथ अनघ ने वेद-मंत्रों का पाठ किया, उसने न केवल सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया, बल्कि ‘वर्ल्ड वाइड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ में उनका नाम तीसरी बार दर्ज करा दिया।
महज 7 वर्ष की आयु में अनघ ने 10 मिनट 48 सेकंड में 50 कठिन वेद-मंत्रों और संस्कृत श्लोकों का लगातार और शुद्ध उच्चारण कर नया विश्व रिकॉर्ड बनाया है। उनके सातवें जन्मदिन 29 जून को यह उपलब्धि आधिकारिक रूप से स्वीकृत हुई और 23 जुलाई को जब विश्व रिकॉर्ड का प्रमाण-पत्र उनके घर पहुंचा तो पूरा परिवार खुशी और गर्व से भावुक हो उठा।
संस्कारों की नींव पर खड़ा हुआ विश्व रिकॉर्ड
यह उपलब्धि केवल एक रिकॉर्ड नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, वेद परंपरा और पारिवारिक संस्कारों की शक्ति का उदाहरण भी है। जिस उम्र में बच्चे खेल-कूद में व्यस्त रहते हैं, उस उम्र में अनघ ने देववाणी संस्कृत के कठिन मंत्रों को आत्मसात कर विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना ली।
तीन बार विश्व रिकॉर्ड बनाकर रचा इतिहास
यह अनघ चित्तौड़ा का पहला नहीं, बल्कि लगातार तीसरा विश्व रिकॉर्ड है।
पहला विश्व रिकॉर्ड: मात्र 3 वर्ष की आयु में 9 अंकों की 50 जोड़ियों की गणना 5 मिनट 20 सेकंड में कर विश्व रिकॉर्ड बनाया।
दूसरा विश्व रिकॉर्ड: 4 वर्ष की आयु में 3 मिनट 1 सेकंड में 50 आयुर्वेदिक मसालों की पहचान कर नया कीर्तिमान स्थापित किया।
तीसरा विश्व रिकॉर्ड: 7 वर्ष की आयु में 50 वेद-मंत्रों और संस्कृत श्लोकों का रिकॉर्ड समय में उच्चारण कर फिर इतिहास रच दिया।
मां बनी पहली गुरु, परिवार बना सबसे बड़ी ताकत
हर बड़ी सफलता के पीछे वर्षों की तपस्या छिपी होती है। अनघ की इस उपलब्धि के पीछे उनकी माता श्रद्धा चित्तौड़ा की अथक मेहनत, धैर्य और संस्कार हैं। उन्होंने अनघ को महज दो वर्ष की आयु से संस्कृत श्लोक, वेद-मंत्र और भारतीय संस्कृति की शिक्षा देना शुरू कर दिया था। पिता प्रणय चित्तौड़ा का निरंतर सहयोग, दादा-दादी अजय चित्तौड़ा एवं ममता चित्तौड़ा तथा नाना-नानी अशोक मेहता एवं उर्मिला मेहता के आशीर्वाद और प्रोत्साहन ने इस सफलता को नई ऊंचाई तक पहुंचाया।
इंदौर ही नहीं, पूरे देश के लिए गर्व का पल
अनघ चित्तौड़ा की यह उपलब्धि केवल एक परिवार की खुशी नहीं, बल्कि इंदौर, मध्यप्रदेश और पूरे देश के लिए गर्व का विषय है। यह साबित करता है कि यदि बचपन से बच्चों को संस्कार, संस्कृति और सही मार्गदर्शन मिले तो वे कम उम्र में भी विश्व स्तर पर भारत का नाम रोशन कर सकते हैं।सनातन संस्कृति की यह गूंज अब विश्व रिकॉर्ड के पन्नों में दर्ज हो चुकी है, और अनघ चित्तौड़ा आज हजारों बच्चों के लिए प्रेरणा बनकर उभरे हैं। उनकी यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों को भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ने का संदेश भी देती है।

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