वीरेन्द्र गहवई, बिलासपुर। अंतरजातीय विवाह के बाद सामाजिक बहिष्कार का सामना कर रही महिला की याचिका पर हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि जांच अधिकारी निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से मामले की जांच करें। महासमुंद जिला निवासी महिला ने दो मार्च को अंतरजातीय विवाह किया था। अंतरजातीय विवाह के बाद सामाजिक बहिष्कार और सामुदायिक अधिकारों से वंचित किए जाने के मुद्दे पर महिला ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

कोर्ट ने जांच में सीधे तौर पर किसी व्यक्ति का नाम जोड़ने या कोई विशेष दिशा-निर्देश देने से इनकार किया, लेकिन जांच अधिकारी को स्वतंत्र रूप से पूरी जांच करने और उपलब्ध सभी साक्ष्यों व इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड पर विचार करने को कहा। विवाह के बाद अंकिता प्रधान दंतेवाड़ा जिले के बचेली में रह रही हैं। याचिका के अनुसार, अंकिता ने दो मार्च 2026 को अंतरजातीय विवाह किया था। विवाह का प्रमाण-पत्र आठ अप्रैल 2026 को जारी हुआ है।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि विवाह के बाद समाज के कुछ प्रभावशाली लोगों ने उन्हें समुदाय के सामाजिक दर्जे और उससे मिलने वाले अधिकारों का लाभ उठाने से रोक दिया। इस संबंध में उन्होंने पुलिस अधिकारियों से शिकायत की थी। उनका कहना था कि पुलिस ने शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज की, लेकिन उनके द्वारा बताए गए सभी निजी प्रतिवादियों के नाम शामिल नहीं किए।
याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि उन्होंने जांच अधिकारी के समक्ष कुछ इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड भी प्रस्तुत किए हैं। इसलिए जांच के दौरान इन रिकॉर्ड को भी साक्ष्य के रूप में ध्यान में रखा जाना चाहिए। उन्होंने निजी प्रतिवादियों के नाम एफआईआर में शामिल करने और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड पर विचार करने के लिए पुलिस को निर्देश देने की मांग की थी।
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