पटना। आईआरसीटीसी घोटाले में लालू प्रसाद, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव पर अदालत द्वारा आरोप तय करने के आदेश के बाद राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सामने गहरा नेतृत्व संकट खड़ा हो गया है। पूरे शीर्ष नेतृत्व के अदालती और कानूनी उलझनों में फंसने से संगठन में शून्य की स्थिति बनती दिख रही है। ऐसे नाजुक समय में सिंगापुर से करीब 10 महीने बाद भारत लौटीं रोहिणी आचार्य पार्टी की कमान संभालती नजर आ रही हैं।
​नवंबर 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में हार के बाद रोहिणी ने राजनीति से दूरी बना ली थी। हालांकि, बदलते घटनाक्रम के बीच उन्होंने फिर से सक्रियता बढ़ा दी है। हाल ही में उन्होंने लालू दौर के प्रभावशाली नेता साधु यादव से मुलाकात की, जिसे पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ताओं को फिर से पार्टी से जोड़ने की एक बड़ी कवायद माना जा रहा है।

​रोहिणी के लिए खुल रहे 3 मुख्य राजनीतिक रास्ते

​संकटमोचक के रूप में कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा: कानूनी शिकंजे के बीच रोहिणी पार्टी के प्रमुख बचावकर्ता के रूप में उभरी हैं। पिता को किडनी देने वाली ‘आदर्श बेटी’ की भावनात्मक छवि और आक्रामक रुख के बल पर वह कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने में सक्षम हैं।
​पुराने दिग्गजों से संवाद और असंतोष पर नियंत्रण: पार्टी संगठन में किसी भी प्रकार के असंतोष को रोकने के लिए रोहिणी पुराने व समर्पित नेताओं की मजबूती से पैरवी कर रही हैं। वरिष्ठ नेताओं से सीधा संवाद कायम कर वह सांगठनिक संतुलन बना रही हैं।
​मुख्य प्रचारक का चेहरा और जनता से सीधा जुड़ाव: दिल्ली प्रदर्शन के दौरान केंद्र सरकार को घेरकर उन्होंने अपनी मजबूत वापसी के संकेत दे दिए हैं। अपने जनाधार और संवाद शैली के दम पर वह आने वाले समय में मुख्य स्टार प्रचारक की भूमिका निभाएंगी।

​राजद को मिलेगा बड़ा रणनीतिक लाभ

​कानूनी संकट गहराने पर रोहिणी पार्टी में पैदा होने वाले नेतृत्व शून्य को तुरंत भर सकती हैं। उनकी ‘आदर्श बेटी’ वाली छवि से राजद को जनता की गहरी सहानुभूति मिलने की उम्मीद है। इस कठिन परिस्थिति में उन्हें पार्टी में मार्गदर्शक, संकटमोचक और मुख्य रणनीतिकार की बड़ी जिम्मेदारी मिलना लगभग तय माना जा रहा है।