Automobile Desk : गाड़ी स्टार्ट करते ही अगर आपके सामने डैशबोर्ड पर लाइटें धीमी पड़ जाएं या इंजनों की घरघराहट के बजाय सिर्फ ‘क्लिक’ की आवाज आए, तो समझ जाएं कि बैटरी दगा दे चुकी है। बार-बार डिस्चार्ज होती बैटरी किसी भी वाहन मालिक का सिरदर्द बढ़ा सकती है। आमतौर पर लोग इसे बैटरी की पुरानी मियाद मानकर नई बैटरी खरीद लाते हैं, लेकिन हर बार खराबी सिर्फ बैटरी की नहीं होती। अगर आप भी इस समस्या से बार-बार परेशान हो रहे हैं, तो तुरंत कुछ अहम हिस्सों की पड़ताल करवाएं।

बैटरी के पॉजिटिव और नेगेटिव पॉइंट्स (टर्मिनल्स) पर जमने वाला सफेद या हल्का नीला पाउडर आपके पूरे इलेक्ट्रिकल सर्किट को ठप कर सकता है। समय के साथ नमी और केमिकल रिएक्शन के कारण यहां जंग लग जाती है। यह परत अल्टरनेटर से बैटरी तक बिजली पहुंचने के रास्ते में रुकावट बनती है। नतीजा यह होता है कि रनिंग के दौरान भी बैटरी पूरी तरह चार्ज नहीं हो पाती। समय-समय पर टर्मिनल्स की सफाई और ग्रीसिंग इस रुकावट को खत्म कर सकती है।
गाड़ी चलने के दौरान बैटरी को एनर्जी देने का असली काम अल्टरनेटर करता है। अगर अल्टरनेटर की बेल्ट ढीली हो या उसके अंदरूनी कंपोनेंट्स कमजोर पड़ जाएं, तो वह पर्याप्त वोल्टेज पैदा नहीं कर पाएगा। इससे कार केवल बैटरी की बची-खुची पावर पर तब तक चलेगी जब तक वह पूरी तरह खाली न हो जाए। यदि बैटरी नई होने के बावजूद डिस्चार्ज हो रही है, तो किसी एक्सपर्ट मैकेनिक से अल्टरनेटर का मल्टीमीटर टेस्ट कराना सबसे जरूरी कदम है।
अक्सर गाड़ी बंद करने के बाद भी कुछ इलेक्ट्रिकल कंपोनेंट्स चोरी-छिपे बिजली सोखते रहते हैं, जिसे ऑटोमोबाइल तकनीक में पैरासिटिक ड्रेन कहा जाता है। गलती से छूटी केबिन लाइट, ग्लोव बॉक्स की लाइट, या बाद में लगवाए गए आफ्टरमार्केट साउंड सिस्टम, जीपीएस ट्रैकर और डैशकैम इसके मुख्य दोषी होते हैं। अगर गाड़ी दो-तीन दिन खड़ी रहने के बाद अपने आप डिस्चार्ज हो जाती है, तो वायरिंग में किसी लीकेज या आफ्टरमार्केट एसेसरीज के कनेक्शन की दोबारा जांच कराएं।
अगर आपकी कार का इस्तेमाल सिर्फ पास की दुकान तक जाने या 1-2 किलोमीटर की छोटी ट्रिप तक सीमित है, तो बैटरी का लाइफस्पैन तेजी से घटता है। कार को स्टार्ट करने में सबसे ज्यादा पावर खर्च होती है, और उसे वापस रिकवर करने के लिए अल्टरनेटर को कम से कम 15 से 20 मिनट की लगातार ड्राइविंग की जरूरत होती है। इसके अलावा अत्यधिक गर्मी बैटरी के अंदर मौजूद इलेक्ट्रोलाइट लिक्विड को सुखा देती है और कड़ाके की ठंड केमिकल रिएक्शन को धीमा कर देती है, जिससे पावर आउटपुट घट जाता है।
एक सामान्य लेड-एसिड कार बैटरी की औसत उम्र 3 से 5 साल मानी जाती है। यदि आपकी बैटरी इस समयसीमा को पार कर चुकी है, तो उसकी चार्ज होल्डिंग क्षमता (बिजली रोककर रखने की क्षमता) प्राकृतिक रूप से खत्म होने लगती है। ऐसी स्थिति में बार-बार जंप-स्टार्ट करने के बजाय किसी अधिकृत सेंटर से बैटरी की हेल्थ और लोड कैपेसिटी चेक कराएं। समस्या की जड़ पकड़े बिना केवल जंप स्टार्ट का सहारा लेना आपको किसी सुनसान सड़क पर भारी परेशानी में डाल सकता है।


