Growing old is a privilege denied to many… युवा दिखने की होड़ में अब ऐसा दौर आ गया है जहां उम्र का बढ़ना किसी अपराध से कम नही लग रहा. उभरती झुर्री, सफेद होते बाल, कम होती नज़र, लरजती कमर सब कुछ को छुपा लेने और मिटा देने की कोशिश की जा रही है. विशेषकर शहरी जीवन में स्त्री-पुरुष खुद को छोटी ऊम्र का दिखाने के लिए बेचैन हैं. एंटी-एजिंग उत्पादों और उपचारों के प्रति बढ़ता आकर्षण इसी मानसिकता का संकेत है. ऐसे समय में थोड़ा सा रुक कर यह सोचना होगा कि क्या उम्र को छिपाकर जीवन को वास्तव में पीछे ले जाया जा सकता है? निसंदेह जवाब यही होगा कि उम्र को रोकना संभव नहीं मगर उम्र को गरिमा के साथ जीना निश्चित रूप से संभव है. युवा दिखने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है अपने भीतर युवा सोच, स्वस्थ व्यक्तित्व और सकारात्मक दृष्टिकोण पैदा करना.

“न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते॥”

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक का भाव है ज्ञान से बढ़कर कुछ भी पवित्र नहीं इसलिए उम्र के साथ अर्जित अनुभव और ज्ञान ही सभी की वास्तविक संपदा हैं.उम्र के साथ चेहरे पर आने वाली रेखाएं आपके ‘अनुभव-पदक’ हैं और सफेद बाल जीवन की अर्जित उपलब्धियों का जीवंत प्रमाण-पत्र. चुस्त-दूरस्त रहना, निरोगी रहना अपने प्रयास से अपना कायाकल्प करना, सदा ही सराहनीय रहा है. मगर यह भी उतना ही सच है कि समाज को बुजुर्गों की छाँव, उनका अनुभव और मार्गदर्शन की भी आवश्यकता है. वास्तविक युवाओं को आज बलात् और कृत्रिम युवाओं की वजह से मार्गदर्शन की कमी महसुस होने लगी है. अंकल, आंटी, दादा, दादी सुनकर भड़क उठने वाले प्रौढ़ों से करबद्ध अनुग्रह है कि अपने चेहरे को चमकाइए चिर युवा बने रहिए इसमें कुछ बुराई मगर कनिष्क आपसे लाड़ जताए तो अपनी असली उम्र का ख़याल करते हुए उन्हें दुत्कारें नहीं. हर जीवन में ऊम्र का एक ऐसा पड़ाव अवश्य आता है जब स्वमेव हृदय में संतत्व जगती है, स्वभाविक रूप से वैराग्य जागता है और यौवन काल का मोह कम या समाप्त हो जाता है. “संत हृदय नवनीत समाना.” रामचरितमानस की इस पंक्ति के भावानुसार संतों का हृदय मक्खन के सामान कोमल होता है.

भारतीय सीने जगत में ऐसे कई कलाकार हुए हैं जिन्होंने अंत तक अपनी अवस्था के अनुरूप भूमिकाएं निभाकर ऊम्र की गरिमा को बनाए रखा. दूसरी तरफ़ इसी इंडस्ट्री में ऊम्र चोर कलाकारों की भी भरमार है जिनका यौवन बहुत पीछे छूट चुका है मगर उनमे से कोई सिंहासन छोड़ने को राज़ी नही हैं. गौर से समाज को देखिए उम्र को स्वीकार न कर पाने की बेचैनी व्यक्ति को उसके वास्तविक व्यक्तित्व से दूर कर रही है. जब यही तय है कि प्रकृति से प्रतिस्पर्धा में हम ही पराजित होंगे तो समय रहते अपनी ऊर्जा को सही राह में लगाइए. उम्र जीवन की स्वाभाविक यात्रा है. इसलिए एक निर्धारित आयु के बाद चेहरे से ज़्यादा चरित्र को निखारिए. आपकी जवानी बेशक खूबसूरत थी मगर अब समय है कि जीवन को खूबसूरत बनाइए.

संदीप अखिल

सलाहकार संपादक

न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम

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