“Good deeds speak louder than words.” मनुष्य के विशाल हृदय का परिचायक होता है उनके द्वारा किया गया परोपकार। बहुत कम लोग इस तथ्य को समझते होंगे कि परमार्थ भी एक बहुत ही सावधानी पूर्वक किया जाने वाला कृत्य है। सहायता, सहयोग और परोपकार करने वालों का दायित्व और बढ़ जाता है क्योंकि सच्ची सहायता वही है जिसमें देने वाले के मन में अहंकार न आने पाए और पाने वाले के मन पर उपकार का कोई बोझ न पड़े। स्मरण रहे परोपकार जितना मौन होगा उसका मूल्य उतना ही गहरा होगा।
किसी के प्रति किए गए उपकार को बार-बार याद करना, उसका उल्लेख करना या अवसर मिलते ही उसे गिनाना यह सब उस सहयोग भावना की निर्मलता को कम करने वाले होते हैं। अपने उपकारों की चर्चा करने वाले सज्जन अनजाने में स्वयं को बड़ा या सामने वाले को छोटा साबित करने लगते हैं। यही वह कुत्सित क्षण होता है जब परोपकार धीरे-धीरे अहंकार का रूप लेने लगता है। समझने के लिए ऐसा मान कर चलें कि जब तक हमारे सदकर्मों की सूची हमारे हाथ में होती है तब तक ईश्वर उसे अपने संज्ञान में नही लेते। परमार्थ को सार्थक करने वाला संस्कृत का एक प्रसिद्ध सुभाषित है
परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥
इसका आशय है वृक्ष, नदियों और गोमाता की तरह परोपकार करना चाहिए। “Do good and forget it.” यानी भलाई करो और उसे भूल जाओ क्योंकि “Good deeds speak louder than words.” अर्थात् अच्छे कर्मों को अपने परिचय के लिए शब्दों की आवश्यकता नहीं होती। कभी-कभी उपकार का बारम्बार स्मरण सामने वाले पर एक अघोषित दबाव भी बना देता है। वह व्यक्ति विचार या व्यवहार में अपनी असहमति व्यक्त करने से भी संकोच करने लगता है क्योंकि वह विरोध कर के कृतघ्न होने का दंश नही सहना चाहता उसे इस बात का भय भी होता है कि विरोध के स्वर उभरते ही उसे, उस पर किए गए पुराने उपकारों की सूची सुना दी जाएगी। ऐसा सहयोग, जगत के लिए मूल्यवान हो सकता है मगर ईश्वरीय दृष्टि से उसे शून्य ही समझा जाना चाहिए। क्योंकि यह मानवता के रेपर में लिपटा हुआ एक विशेष तरह का सौदा होता है। यदि किसी दान की वस्तु पर दाता का नाम इतना बड़ा लिख दिया जाए कि दान से अधिक दाता दिखाई देने लगे, पंखे की हर पंखुड़ी में दानदाता अपना नाम लिख कर दान कर आता है कि इसकी हवा खाने वाला हर व्यक्ति जान सके यह सब किसकी कृपा से हो रहा है। इस मानसिकता के दानशीलों को वांछित पुण्य लाभ पाने में निश्चित दिक़्क़त आती होगी।
“The left hand should not know what the right hand is doing.” अँग्रेज़ी के इस proverb का भावार्थ यह है कि सच्चे दान का प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्। दूसरों पर किया गया उपकार निश्चित रूप से पुण्य है मगर उसका बखान उसे उपकृत को पीड़ा देता है और उपकारी पाप का अर्जन करत है। पुण्य का अभिमान इतना सूक्ष्म होता है कि उसे ढूँढने में एक जीवन कम पड़ सकता है। इसलिए परोपकार कीजिए और उसे तत्काल विस्मृत कर दीजिए, सहायता सहयोग की कोई खाता बही अपने पास मत रखिए।

संदीप अखिल
सलाहकार संपादक
न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम
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