चेतन योगी, देवास। मध्य प्रदेश के देवास जिले के कलेक्ट्रेट कार्यालय से फर्जी आदेश जारी करने का चौंकाने वाला मामला सामने आया है। जिसने प्रशासनिक तंत्र की साख पर सीधा सवाल खड़ा कर दिया है। इस सनसनीखेज खुलासे में सरकारी बाबुओं और एक दलाल की कथित मिलीभगत उजागर हुई है। कलेक्टर ने सबसे पहले BNP थाना पुलिस को एक शिकायत पत्र भेजा। जांच के बाद BNP थाना पुलिस ने धोखाधड़ी, सरकारी दस्तावेजों में कूटनीतिक तरीके से तैयार करना समेत विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया। वहीं नजूल शाखा के बाबू रमेश लोबानिया, अपर कलेक्टर कार्यालय के बाबू संजय जाटव, विजयागंज मंडी तहसील के बाबू जितेंद्र भद्रे और एक दलाल को गिरफ्तार किया है।

शहर CSP सुमित अग्रवाल ने मीडिया को बताया कि सरकारी कर्मचारियों ने विभिन्न जिम्मेदार पदों पर पदस्थ होते हुए फर्जी कागज तैयार कर छोटे लोगों की जमीन बेचने का प्रयास किया था। करीब 10 दिन पहले कलेक्टर ऋतुराज सिंह को मामले की जानकारी मिली तो संदिग्ध लगने पर कलेक्टर ने तत्काल एक शिकायत पत्र शहर की BNP थाने पर दिया। जिस पर जांच में सामने आया कि कलेक्ट्रेट के नाम पर फर्जी आदेश जारी कर न केवल नियमों को ताक पर रखा गया, बल्कि सरकारी प्रक्रियाओं का दुरुपयोग करते हुए सरकारी दस्तावेजों में कूटनीतिक करना, रुपये के लालच में किया गया।

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दलाल की संलिप्तता ने मामले को बनाया गंभीर

यह कलेक्टर फर्जी पत्र में गड़बड़ी नहीं बल्कि एक सुनियोजित फर्जीवाड़ा है, जिसमें अंदरूनी स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों की भूमिका बेहद अहम रही। आरोप है कि सरकारी दस्तावेजों की विश्वसनीयता का फायदा उठाकर फर्जी आदेश तैयार किए गए और उन्हें वैध दिखाने की कोशिश की गई। इस पूरे खेल में एक दलाल की संलिप्तता ने मामले को और गंभीर बना दिया है। वहीं इस घटना ने कलेक्ट्रेट की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आम जनता में भी आक्रोश है कि यदि सरकारी कार्यालयों से ही फर्जी आदेश जारी होने लगें, तो व्यवस्था पर भरोसा कैसे कायम रहेगा। फिलहाल पुलिस पूरे मामले की तह तक जाने में जुटी है और आने वाले दिनों में इस घोटाले से जुड़े और बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।

फर्जी तरीके से कागज तैयार कर जमीन बेचने की कोशिश

अपर कलेक्टर कार्यालय के बाबू जाटव, विजयागंज मंडी तहसील के बाबू भद्रे, एसडीएम देवास नजूल शाखा के बाबू लोबानिया और एक दलाल कुशवाहा के खिलाफ धोखाधड़ी सहित अन्य धाराओं में मामला दर्ज कराया है। इन्होंने हर कागज फर्जी तैयार कर छोटे लोगों की जमीन बेचने का प्रयास किया है। एक किसान की तो रजिस्ट्री भी करवा दी थी, जिसको शून्य करवाया है। अब जांच का विषय यह हैं कि जिम्मेदार सरकारी कर्मचारियों ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को विश्वास में लेकर या उन्हें संज्ञान में लिए बिना इस तरह की गंभीर धोखाधड़ी कर आदिवासी की जमीन का व्यापारीकरण कर दिया गया।

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