पटना। पटना हाईकोर्ट ने बांका जिले से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए आरोपी को राहत दी है। न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी महिला की लज्जा भंग करना और दुष्कर्म का प्रयास करना दोनों अलग-अलग अपराध हैं। कोर्ट ने कहा कि यदि साक्ष्य स्पष्ट नहीं हैं, तो दुष्कर्म के प्रयास की धारा के तहत सजा नहीं दी जा सकती।

​निचली अदालत का फैसला पलटा

बांका के अमरपुर थाना कांड संख्या 14/2008 में निचली अदालत ने 1 नवंबर 2023 को हिमांशु कुमार पाठक को आईपीसी की धारा 376/511 (दुष्कर्म का प्रयास) के तहत दोषी माना था। उसे तीन साल की सश्रम कारावास और पांच हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी। इस फैसले के खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील की थी। हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया और बेल बॉन्ड से मुक्त करने के साथ ही जमा जुर्माना राशि वापस करने का निर्देश दिया।

​क्या था पूरा मामला और कोर्ट की टिप्पणी?

  • मामला अमरपुर स्थित एक स्टूडियो का है, जहां आरोपी पर युवती को बंधक बनाने और उसके कपड़े उतारने का प्रयास करने का आरोप था। हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी की:
  • ​कानूनी व्याख्या: कोर्ट ने माना कि आरोपी का कृत्य आईपीसी की धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करने) के दायरे में आता है, न कि दुष्कर्म के प्रयास (376/511) के।
  • ​साक्ष्यों का अभाव: अभियोजन पक्ष दुष्कर्म के प्रयास के लिए आवश्यक ‘पेनेट्रेशन’ या किसी स्पष्ट कृत्य को साबित करने में विफल रहा।
  • ​गवाही में खामी: इस मामले में सबसे बड़ी चूक जांच अधिकारी (IO) और मेडिकल जांच करने वाले डॉक्टर की गवाही न होना थी। इसके अलावा, एक मुख्य गवाह भी अदालत में मुकर गया।

पीड़िता की मां की गवाही सुनी-सुनाई बातों पर आधारित थी, जिसे ठोस सबूत नहीं माना गया।
हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी करीब साढ़े तीन महीने जेल में काट चुका है। साक्ष्यों के अभाव और कानूनी प्रक्रियात्मक खामियों के कारण अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ दोषसिद्ध करने में असमर्थ रहा। इस फैसले ने यह स्थापित किया है कि कानूनी न्याय प्रक्रिया में मेडिकल साक्ष्य और ठोस गवाहों की भूमिका कितनी निर्णायक होती है।