अभय मिश्रा, मऊगंज। मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार जिस ‘सीएम हेल्पलाइन 181’ को आम जनता की समस्याओं के त्वरित निराकरण की सबसे बड़ी संजीवनी मानती है, मऊगंज पुलिस के एक शातिर सिंडिकेट ने उसे ही ‘भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े’ की भेंट चढ़ा दिया है। जिले में थाने की रैंकिंग को नंबर वन बनाए रखने और आला अधिकारियों की नजरों में कागजी छवि चमकाने के लिए मऊगंज पुलिस ने कानून-व्यवस्था का ऐसा मखौल उड़ाया है, जिसने खाकी को बुरी तरह दागदार कर दिया है।

पॉकेट गवाहों के पुराने इतिहास के बाद, अब मऊगंज पुलिस का एक ऐसा संगठित गिरोह सामने आया है जो खुद ही फर्जी नामों से पुलिस के खिलाफ संगीन शिकायतें दर्ज कराता था और फिर बंद कमरों में कागजों पर उसका ‘जादुई’ निराकरण कर वाहवाही लूटता था।

 21 मोबाइल नंबर और 233 फर्जी शिकायतें: जानिए कौन-कौन है सिंडिकेट में शामिल

सूत्रों और लल्लूराम.काम की पड़ताल से हुए चौंकाने वाले खुलासे के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों के भीतर महज 21 मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल करके 233 फर्जी शिकायतें दर्ज कराई गईं है। इस पूरी साजिश की कड़ियां मऊगंज थाने के भीतर से ही जुड़ी हैं। आरक्षक विवेक यादव: शिकायतें निपटाने का जिम्मा संभालने वाले इस आरक्षक ने अपने ही नंबर से ‘अशोक तिवारी’ नामक काल्पनिक व्यक्ति के नाम पर कई फर्जी शिकायतें ठोक दीं।

 प्रवेश चौबे और कृष्णा कुशवाहा (डायल 112 कर्मी): इन्होंने ‘ओमप्रकाश कुशवाहा’ के नाम से फर्जी शिकायतें दर्ज कराईं।

 दयाशंकर तिवारी (थाना प्रभारी का निजी ड्राइवर): हद तो तब हो गई जब टीआई के सरकारी वाहन के निजी ड्राइवर ने ‘रीता पांडे’ के नाम से फर्जी शिकायत दर्ज करवा दी।

 ओवर-कॉन्फिडेंस का नमूना: 4 मिनट में दर्ज हुईं 5 शिकायतें

इस सिंडिकेट की जल्दबाजी और ओवर-कॉन्फिडेंस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शिकायतें किसी पीड़ित ने नहीं, बल्कि थाने में बैठे शातिरों ने चंद मिनटों के अंतराल में दर्ज की थीं।

सुबह 11:30 बजे: शिकायत क्रमांक 38687509 दर्ज होती है।

 सुबह 11:31 बजे: ठीक एक मिनट बाद, शिकायत क्रमांक 38687518 दर्ज की जाती है।

 सुबह 11:32 बजे: अगले ही मिनट, शिकायत क्रमांक 38687522 दर्ज होती है।

 सुबह 11:33 बजे: एक साथ दो और शिकायतें (38687533 और 38687544) दर्ज हो जाती हैं।

महज 4 मिनट के भीतर 5 गंभीर शिकायतें!

 ऐसा ही एक और कारनामा शाम को किया गया, जब 5 बजकर 1 मिनट से लेकर 5 बजकर 7 मिनट के बीच (सिर्फ 6 मिनट में) लगातार 5 और शिकायतें दर्ज करा दी गईं।क्या कोई आम इंसान इतनी तेजी से शिकायतें दर्ज करा सकता है।

 रैंकिंग की अंधी दौड़: लूट, डकैती और छेड़छाड़ को बनाया हथियार

हैरानी की बात यह है कि ये शिकायतें किसी छोटे-मोटे सिविल मामलों की नहीं थीं। ग्रेडिंग के मामले में मऊगंज थाने को जिले में ‘नंबर वन’ बनाए रखने के लिए इस सिंडिकेट ने बच्चों के गुम होने, लूट, डकैती, नाबालिग बच्चियों से छेड़छाड़, रास्ता रोकने और पुलिस द्वारा अभद्र व्यवहार किए जाने जैसी संगीन धाराओं से जुड़ी फर्जी शिकायतें दर्ज कीं। यह पूरा खेल हर महीने के आखिरी दिनों में खेला जाता था—ताकि खुद ही शिकायत लिखकर, खुद ही उसका त्वरित समाधान दिखाकर केस क्लोज कर दिया जाए।

 कटघरे में थाना प्रभारी: क्या टीआई रीना सिंह बेखबर थीं?

अब सबसे बड़ा सवाल मऊगंज थाने की कमान संभाल रही थाना प्रभारी रीना सिंह  पर खड़ा होता है। सीएम हेल्पलाइन की व्यवस्था के मुताबिक, इन शिकायतों के समाधान के लिए L1 अधिकारी खुद थाना प्रभारी होती हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मैडम को अपनी नाक के नीचे चल रहे इस संगठित सिंडिकेट की भनक तक नहीं थी? या फिर अपनी कुर्सी बचाने और अपनी झूठी पीठ थपथपवाने के लिए इस फर्जीवाड़े को उनकी मौन सहमति मिली हुई थी? आरक्षक विवेक यादव पर पहले भी गंभीर आरोप लग चुके हैं, और ड्राइवर दयाशंकर तिवारी कई मामलों में संदिग्ध गवाह रहा है, इसके बावजूद इन्हें थाने में खुली छूट क्यों मिली हुई थी?

हाल ही में मध्य प्रदेश सरकार ने ‘ब्लैकमेलर और झूठी शिकायत’ करने वाले तत्वों की सूची जिला कलेक्टरों से मांगी थी, लेकिन मऊगंज में तो खुद कानून के रखवाले ही सबसे बड़े ‘झूठे शिकायतकर्ता’ बनकर सामने आए हैं। जनता की समस्याओं को सुनने के लिए बना यह पारदर्शी सिस्टम आज मऊगंज पुलिस की रेटिंग सुधारने का टूल बन चुका है।अब देखना यह है कि मऊगंज पुलिस अधीक्षक सुरेंद्र जैन और रीवा जोन के पुलिस महानिरीक्षक  गौरव राजपूत इस संगठित गिरोह और अपनी जिम्मेदारी से बेखबर L1 अधिकारी पर क्या कड़ा एक्शन लेते हैं? क्या मुख्यमंत्री की इस अति-महत्वाकांक्षी योजना का मजाक उड़ाने वाले इन वर्दीधारियों पर कड़ी कार्रवाई होती है , या फिर कागजी ग्रेडिंग का यह गंदा खेल ऐसे ही अनवरत चलता रहेगा?

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