रवि साहू, नारायणपुर। घने जंगल, ऊंचे पहाड़, नदी-नाले और दुर्गम रास्तों के बीच बसा अबूझमाड़ लंबे समय तक नक्सलवाद के साये में रहा। यहां विकास के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच भी बड़ी चुनौती थी। खासकर गर्भवती महिलाओं के लिए प्रसव के समय अस्पताल तक पहुंचना किसी जंग से कम नहीं था। कई बार महिलाओं को कांवड़ में बैठाकर कई किलोमीटर तक दुर्गम रास्तों से ले जाना पड़ता था, लेकिन अब अबूझमाड़ की तस्वीर बदल रही है। अबूझमाड़ में संचालित 8 ‘मायका केंद्र’ और बाइक एंबुलेंस सेवा ने दूरस्थ इलाकों की गर्भवती महिलाओं के लिए सुरक्षित मातृत्व की राह आसान की है।

अबूझमाड़ में कभी एक महिला के लिए सुरक्षित प्रसव तक पहुंचना भी किसी जंग से कम नहीं था। प्रसव पीड़ा शुरू होने के बाद परिजन गर्भवती महिला को कांवड़ में लादकर नदी-नाले और पहाड़ पार करते हुए स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाने को मजबूर होते थे। कई बार रास्ते की दुर्गमता के कारण समय पर अस्पताल पहुंचना संभव नहीं हो पाता था। ऐसे में कई महिलाओं का प्रसव घर पर ही या बीच रसीद में ही कराया जाता था, जहां संक्रमण और जच्चा-बच्चा दोनों की जान को खतरा बना रहता था।

यानी जिस दौर में नक्सलवाद विकास के रास्ते में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बना हुआ था, उसी दौर में अबूझमाड़ की माताओं के लिए सुरक्षित मातृत्व भी एक सपना बनकर रह गया था, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। नक्सलवाद के प्रभाव से बाहर निकलते अबूझमाड़ में विकास के पहिए तेजी से घूम रहे हैं। सड़कों और संचार के विस्तार के साथ स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच भी उन इलाकों तक बढ़ रही है, जहां कभी शासन-प्रशासन की पहुंच बेहद मुश्किल मानी जाती थी।

इसी बदलाव की एक बड़ी मिसाल हैं ‘मायका केंद्र’। अबूझमाड़ में गर्भवती महिलाओं की सुविधा के लिए कुल 8 मायका केंद्र संचालित किए जा रहे हैं। इन केंद्रों में दूरस्थ और दुर्गम गांवों की गर्भवती महिलाओं को प्रसव से पहले ही सुरक्षित स्थान पर लाकर रखा जाता है। यहां उन्हें मायके की तरह देखभाल, भोजन और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं, ताकि प्रसव के समय उन्हें जंगल, पहाड़ और नदी-नालों के बीच जिंदगी की जंग न लड़नी पड़े।

अब तक इन मायका केंद्रों में 280 से अधिक गर्भवती महिलाओं का पंजीयन हो चुका है, जबकि 80 से अधिक महिलाओं का सुरक्षित प्रसव कराया जा चुका है।दुर्गम इलाकों में जहां सामान्य एंबुलेंस का पहुंचना आज भी मुश्किल है, वहां बाइक एंबुलेंस भी ग्रामीणों के लिए बड़ी राहत बनकर सामने आई है। जरूरत पड़ने पर बाइक एंबुलेंस के जरिए मरीजों को दुर्गम गांवों से मुख्य सड़क तक लाया जाता है और वहां से स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया जाता है। कभी जिस अबूझमाड़ में नक्सलवाद के खौफ के कारण विकास की आवाज दब जाती थी, उसी अबूझमाड़ में आज स्वास्थ्य सेवाएं उन मांओं तक पहुंच रही हैं, जिनके लिए सुरक्षित प्रसव कभी सबसे बड़ी चुनौती हुआ करता था, जहां कभी अस्पताल तक पहुंचने का रास्ता जिंदगी और मौत के बीच का सफर हुआ करता था, वहां अब मायका केंद्र और बाइक एंबुलेंस ने सुरक्षित मातृत्व की राह आसान कर दी है।

योजना से माताओं और शिशुओं की मृत्यु दर में आई कमी- मंत्री केदार कश्यप

मंत्री केदार कश्यप ने कहा हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संकल्प, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के दृढ़ निश्चय और सुरक्षा कर्मियों की कोशिशों की बदौलत, हमारे मुख्यमंत्री के नेतृत्व में यह पूरा इलाका और असल में पूरा राज्य और देश नक्सलवाद से मुक्त हो रहा है। सुरक्षा कर्मियों ने बहुत मेहनत की है और मैं उन्हें बधाई देता हूँ। हमारे मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने ‘मायका’ कार्यक्रम शुरू किया, जिसके तहत ऐसे आठ केंद्र खोले गए। विशेषज्ञ उन्हें सलाह दे रहे हैं और पोषण संबंधी सहायता के साथ तैयार कर रहे हैं, ताकि यह पक्का किया जा सके कि न तो माताओं और न ही बच्चों को कुपोषण का सामना करना पड़े, और अबुझमाड़ के बच्चे स्वस्थ पैदा हों।

इसके अलावा, इस योजना से माताओं और शिशुओं की मृत्यु दर में लगातार कमी आई है, चूंकि इन इलाकों में बस्तियाँ दूर-दूर तक फैली हुई हैं, इसलिए हमें यह पक्का करना होगा कि स्वास्थ्य सेवाएं उन तक पहुंचें। शुरू की गई मोटरबाइक एम्बुलेंस सेवा से मरीज़ों और स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाने वाले अन्य लोगों को इलाज मिल पा रहा है और वे अब स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठा रहे हैं। इस सिस्टम के ज़रिए एक बड़ी पहल लागू की जा रही है।

IMR और MMR जैसी समस्याओं से निपटने शुरु शुरु हुई योजना- कलेक्टर नम्रता जैन

नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन ने कहा हमने नारायणपुर ज़िले में ‘मायका’ सेंटर शुरू किए हैं, ताकि माताओं की सेहत और IMR (शिशु मृत्यु दर) व MMR (मातृ मृत्यु दर) जैसी समस्याओं से निपटा जा सके, क्योंकि ये दरें यहां ज़्यादा रही हैं। हमने अब तक ऐसे आठ सेंटर शुरू किए हैं, जब कोई महिला गर्भवती होती है, तो उसे वहां सही सलाह मिलती है।

दूसरा हिस्सा बाइक एम्बुलेंस का इस्तेमाल है। यहां पक्की सड़कें नहीं हैं क्योंकि यह इलाका पहले नक्सल-प्रभावित था और हाल ही में खुला है। हमने ऐसी मोटरबाइक एम्बुलेंस तैनात की हैं, जो इन दूर-दराज़ के इलाकों में जा सकती हैं। इनमें गर्भवती महिलाओं को सेंटर तक ले जाने के लिए आरामदायक सीटिंग की सुविधा है, जिससे संस्थागत प्रसव (अस्पताल में डिलीवरी) को बढ़ावा मिलता है।

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