अभय मिश्रा, मऊगंज। मध्य प्रदेश के मऊगंज में प्रशासनिक अफसरों का आलम यह है कि आम नागरिक तो दूर, खुद न्यायपालिका के आदेशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। आम आदमी कोर्ट से आदेश लेकर अफसरों के चक्कर काटता है और अफसर अपने ही आदेशों का पालन नहीं करा पाते। लेकिन मऊगंज की अदालत ने प्रशासनिक बेपरवाही पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
द्वितीय व्यवहार न्यायाधीश कनिष्ठ खंड, मऊगंज की अदालत ने नईगढ़ी के तहसीलदार सुनील कुमार द्विवेदी को कोर्ट के आदेश की बार-बार अवहेलना करने पर BNS की धारा 384 के तहत दोषी ठहराया है। अदालत ने तहसीलदार पर 50 रुपये का अर्थदंड लगाया है और जुर्माना जमा न करने की सूरत में 1 माह के साधारण कारावास की सजा निर्धारित की है। इतना ही नहीं, कोर्ट ने जिला मऊगंज कलेक्टर संजय कुमार जैन को आदेश जारी किया है कि इस दंडात्मक कार्रवाई की एंट्री तहसीलदार की ‘सेवा पुस्तिका’ यानी ‘सर्विस बुक’ में की जाए।
ये है मामला
मऊगंज जिले में न्याय प्रणाली को मजबूत करने और बेलगाम अफसरों पर नकेल कसने की दिशा में यह फैसला एक मिसाल बन गया है। मामला नईगढ़ी तहसील के निष्पादन प्रकरण से जुड़ा है। अदालत ने 18 अप्रैल 2026 को आदेश जारी कर तहसीलदार सुनील कुमार द्विवेदी को मौके पर उपस्थित रहकर कब्जे की कार्रवाई कराने और 4 मई 2026 तक पालन प्रतिवेदन प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था। लेकिन तय समय सीमा बीत जाने के बाद भी कोर्ट में कोई रिपोर्ट जमा नहीं की गई।
कई बार दिया मौका
न्यायालय ने बार-बार मौका दिया। 26 मई को दोबारा पत्र भेजकर 29 मई को कार्रवाई और 5 जून तक रिपोर्ट मांगी गई। इसके बावजूद न तो रिपोर्ट पेश हुई और न ही समय बढ़ाने का कोई आवेदन आया। कोर्ट ने 26 मई, 13 जून, 19 जून और 25 जून 2026 तक लगातार इंतजार किया। 25 जून को कारण बताओ नोटिस जारी कर 29 जून तक जवाब मांगा गया, लेकिन उस दिन भी कोई जवाब पेश नहीं किया गया। कोर्ट ने फिर भी 3 दिन की मोहलत देकर 2 जुलाई की तारीख तय की।
3 जुलाई को तहसीलदार कार्यालय ने चाल चलते हुए 9 जुलाई को कार्रवाई के लिए दल गठित किया। लेकिन कोर्ट के सामने जब तथ्य आए, तो चौंकाने वाली बात सामने आई। 3 जून 2026 को ही तैयार ‘स्थल पंचनामा’ दबाकर रखा गया था। आपराधिक नोटिस मिलते ही तहसीलदार कार्यालय ने एक ही दिन में अलग-अलग तारीखों के प्रतिवेदन हड़बड़ी में पेश कर दिए। अदालत ने इसे तकनीकी देरी मानने से इनकार कर दिया। तहसीलदार ने सफाई दी कि ‘परिस्थितियों के कारण समय लगा, कोई जानबूझकर गलती नहीं हुई और वे क्षमाप्रार्थी हैं।’ लेकिन कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया।
फजीहत से बचने तहसीलदार ने जमा किया जुर्माना
अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के पेरियम्मल बनाम राजमणि मामले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि कोर्ट के आदेशों का अनुपालन केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि कानूनी जिम्मेदारी है। कोर्ट ने माना कि BNS की धारा 384 के तहत अपराध प्रमाणित होता है। अदालत ने तहसीलदार पर 50 रुपये का जुर्माना ठोका और न देने पर 1 माह की साधारण जेल की सजा सुनाई। साथ ही मऊगंज कलेक्टर को पत्र भेजकर इसे तहसीलदार की सर्विस बुक में दर्ज करने का हुक्म दिया। फजीहत से बचने के लिए तहसीलदार ने 17 अगस्त 2026 को चालान क्रमांक 0020492 के माध्यम से 50 रुपये का जुर्माना तुरंत जमा कर दिया।
इस फैसले से अधिकारी लेंगे सबक!
यह फैसला मऊगंज की उस व्यवस्था पर सीधा प्रहार है, जहां अफसर खुद के आदेशों पर अमल नहीं कराते और आम आदमी को मजबूर होकर बार-बार कोर्ट की शरण में जाना पड़ता है। मऊगंज कोर्ट का यह कड़ा आदेश जिले में कानून-व्यवस्था को मजबूती देने और गैर-जिम्मेदार अफसरों को सबक सिखाने का काम करेगा। अदालत का यह फैसला सिर्फ 50 रुपये के जुर्माने तक सीमित नहीं है, बल्कि अब अवमानना का यह दाग तहसीलदार की सर्विस बुक में हमेशा के लिए दर्ज रहेगा। उम्मीद है कि इस फैसले से मऊगंज के अन्य प्रशासनिक अधिकारी सबक लेंगे और आम जनता को अपने जायज कामों के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।

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