सोहराब आलम/मोतिहारी। बिहार सरकार द्वारा सरकारी स्कूलों में शिक्षा के साथ-साथ बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए शुरू की गई ‘खेल सामग्री खरीद योजना’ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। पूर्वी चंपारण (मोतिहारी) जिले के सरकारी स्कूलों में खेल सामग्री की खरीद में बड़े पैमाने पर अनियमितता और घोटाले का सनसनीखेज खुलासा हुआ है।
जांच में खुली विभाग की पोल
इस पूरे मामले का पर्दाफाश तब हुआ जब माध्यमिक जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (DPO) नित्यम कुमार गौरव ने विभिन्न प्रखंडों में पायलट प्रोजेक्ट के तहत औचक निरीक्षण किया। जिलाधिकारी सौरभ जोरवाल को अभिभावकों से लगातार मिल रही शिकायतों के बाद यह जांच कमेटी गठित की गई थी। जांच दल जब अरेराज, चिरैया, रामगढ़वा, तुरकौलिया और हरसिद्धि जैसे प्रखंडों के स्कूलों में पहुंचा, तो वहां का नजारा देख अधिकारी भी दंग रह गए।
सामान गायब, पैसा साफ
जांच में मुख्य रूप से तीन तरह की गंभीर गड़बड़ियां सामने आई हैं:
- घटिया गुणवत्ता: जिन स्कूलों ने सामान खरीदा, वहां सामग्री की गुणवत्ता बेहद खराब पाई गई, जो बच्चों के खेलने लायक नहीं थी।
- कागजी खेल: रिकॉर्ड बुक में दर्ज खेल सामग्री और स्कूल में मौजूद वास्तविक सामान के बीच जमीन-आसमान का अंतर मिला।
- राशि की बंदरबांट: सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि कई स्कूलों ने 31 मार्च की डेडलाइन से पहले सरकारी राशि की निकासी तो कर ली, लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी एक भी गेंद या बल्ला नहीं खरीदा गया।
विकास की राशि पर भ्रष्टाचार का साया
गौरतलब है कि बिहार सरकार ने खेलकूद को बढ़ावा देने के लिए हाई स्कूलों को 25 हजार, मिडिल स्कूलों को 10 हजार और प्राथमिक विद्यालयों को 5 हजार रुपए की राशि आवंटित की थी। सरकार का उद्देश्य ग्रामीण प्रतिभाओं को मंच देना था, लेकिन स्थानीय स्तर पर शिक्षा विभाग के अधिकारियों और स्कूल प्रशासन की मिलीभगत ने इस योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। फिलहाल, डीपीओ की रिपोर्ट के बाद जिले के भ्रष्ट शिक्षकों और कर्मचारियों में हड़कंप मचा हुआ है और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की तलवार लटक रही है।
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