वीरेंद्र कुमार, नालंदा। जिले में मौसम के अचानक बदले मिजाज ने अन्नदाताओं की कमर तोड़कर रख दी है। बेमौसम बारिश, तेज आंधी और चक्रवाती तूफान के कहर ने किसानों की महीनों की कड़ी मेहनत पर पानी फेर दिया है। खेतों में लहलहाती और कटकर रखी फसल के बर्बाद होने से किसानों पर आर्थिक संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

​खेतों में बर्बाद हुई फसल और बढ़ता संकट

​जिले के कई इलाकों में तेज हवाओं के कारण खेतों में खड़ी धान की फसल पूरी तरह जमीन पर बिछ गई है। वहीं, जिन किसानों ने अपनी फसल की कटाई कर ली थी, उनका धान लगातार हो रही बारिश के कारण खेतों में ही भीगकर सड़ रहा है। इस प्राकृतिक आपदा के चलते धान की गुणवत्ता और कुल उत्पादन दोनों पर ही भारी असर पड़ने की पूरी आशंका है।

​रबी फसलों की बुआई पर मंडराया संकट

​धान की कटाई में हो रही इस अवांछित देरी से किसानों की चिंताएं और अधिक बढ़ गई हैं। किसानों को अब इस बात का डर सता रहा है कि यदि मौसम जल्द साफ नहीं हुआ और खेत खाली नहीं हुए, तो समय पर रबी फसलों की बुआई करना मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में अन्नदाताओं के सामने फसल बर्बादी और अगली फसल की बुआई में देरी का दोहरा संकट खड़ा हो गया है।

​किसानों की प्रमुख मांगें और सरकार से उम्मीद

​इस गंभीर स्थिति को देखते हुए स्थानीय किसानों नीतीश कुमार, तरुण यादव, विक्की सिंह, राजवीर सिंह, राजन सिंह, हारो सिंह और बिट्टू सिंह ने केंद्र और राज्य सरकार से तुरंत प्रभाव से ठोस कदम उठाने की मांग की है। किसान नेताओं ने मांग रखी है कि:

  • पूरे नालंदा जिले में हुए फसल नुकसान का निष्पक्ष और तुरंत आकलन कराया जाए।
  • ​प्रभावित किसानों को 30 हजार रुपये प्रति एकड़ की दर से तुरंत आर्थिक मुआवजा दिया जाए।
  • ​किसानों से जुड़ी सभी प्रकार की राजस्व वसूली पर तुरंत प्रभाव से रोक लगाई जाए। किसानों के सभी छोटे-बड़े कर्ज माफ किए जाएं।

​क्या मिलेगा अन्नदाताओं को समय पर न्याय?

​फिलहाल, प्राकृतिक आपदा से बेहाल नालंदा के किसानों की निगाहें पूरी तरह से शासन और प्रशासन के फैसलों पर टिकी हुई हैं। बड़ा सवाल यह है कि सरकार इन किसानों के दर्द को समझते हुए कब तक राहत पहुंचाती है, या फिर किसानों को अपनी इस तबाही का बोझ खुद ही उठाना पड़ेगा।