देश की राजधानी दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास के नजदीक स्थित रेस कोर्स मस्जिद (Race Course mosque) को लेकर कानूनी विवाद सामने आया है। मस्जिद को बचाने और वहां नमाज अदा करने की अनुमति देने की मांग को लेकर अदालत पहुंचे याचिकाकर्ता को दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) से झटका लगा है। अदालत ने मस्जिद में नमाज अदा करने की इजाजत नहीं दी। इस मामले में केंद्र सरकार की ओर से कहा गया है कि संबंधित स्थल को तब तक नहीं तोड़ा जाएगा, जब तक वक्फ बोर्ड के प्रतिनिधित्व से जुड़े मामले पर फैसला नहीं हो जाता। याचिकाकर्ता ने स्थल को बचाने के लिए कानूनी हस्तक्षेप की मांग की थी, लेकिन हाई कोर्ट ने नमाज की अनुमति देने से इनकार कर दिया।

दिल्ली हाई कोर्ट में जयपुर पोलो ग्राउंड परिसर स्थित रेस कोर्स मस्जिद को लेकर चल रहे मामले में केंद्र सरकार ने अहम आश्वासन दिया है। केंद्र सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि दिल्ली वक्फ बोर्ड को प्रतिनिधित्व देने के मुद्दे पर चार सप्ताह के भीतर जल्द से जल्द फैसला लिया जाएगा। तब तक संबंधित स्थल पर कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। मंगलवार को जस्टिस अनीश दयाल की पीठ ने मस्जिद को तोड़े जाने से बचाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा था।

केंद्र सरकार ने अदालत में क्या कहा?

केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए केंद्रीय सरकारी स्थायी अधिवक्ता (CGSC) आशीष दीक्षित ने अदालत को बताया कि दिल्ली वक्फ बोर्ड को प्रतिनिधित्व दिए जाने के मामले में चार सप्ताह के भीतर फैसला करने का प्रयास किया जाएगा। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि तब तक कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। मामले की अगली सुनवाई अब 16 दिसंबर को निर्धारित की गई है। अदालत में आगे की कार्यवाही के दौरान वक्फ बोर्ड के प्रतिनिधित्व और संबंधित स्थल की स्थिति से जुड़े मुद्दों पर विचार किया जा सकता है।

केंद्र सरकार ने क्या दलील दी?

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश केंद्रीय सरकारी स्थायी अधिवक्ता (CGSC) आशीष दीक्षित ने कहा कि सैयद अहमद सऊद के पास इस मामले में अदालत का रुख करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। उन्होंने अदालत के समक्ष याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसी याचिकाओं को अनुमति देने से इस तरह के मामलों की संख्या बढ़ सकती है। दीक्षित ने यह भी बताया कि संबंधित परिसर में एक मस्जिद और एक मंदिर स्थित हैं। उनके मुताबिक, फिलहाल इन दोनों धार्मिक स्थलों को ध्वस्त करने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।

वक्फ बोर्ड ने अधिकारियों को दिया प्रतिवेदन

सुनवाई के दौरान दिल्ली वक्फ बोर्ड की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि बोर्ड ने भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) और अन्य संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया है। इस पर केंद्र सरकार के वकील ने कहा कि दिल्ली वक्फ बोर्ड और याचिकाकर्ता की ओर से दिए गए प्रतिवेदनों पर संबंधित अधिकारी फैसला करेंगे। केंद्र सरकार की ओर से पहले अदालत को आश्वासन दिया गया था कि दिल्ली वक्फ बोर्ड को प्रतिनिधित्व देने के मुद्दे पर चार सप्ताह के भीतर जल्द से जल्द निर्णय लिया जाएगा। साथ ही, तब तक संबंधित स्थल पर कोई कार्रवाई नहीं करने की बात कही गई थी।

मस्जिद में प्रवेश की अनुमति देने की मांग

याचिकाकर्ता के वकील एम. सुफियान सिद्दीकी ने अदालत से आग्रह किया कि मामले की सुनवाई पूरी होने तक लोगों को मस्जिद में प्रवेश करने दिया जाए। उनका कहना था कि कानूनी प्रक्रिया जारी रहने के दौरान भी मस्जिद तक पहुंच का रास्ता खुला रहना चाहिए। सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल किया कि इलाके में बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ होने के बावजूद याचिकाकर्ता मस्जिद को सुरक्षा देने की मांग किस आधार पर कर रहा है। इसके जवाब में सिद्दीकी ने दलील दी कि मस्जिद द्वितीय श्रेणी (ग्रेड-II) की संरक्षित इमारत है। इसलिए इसमें किसी भी तरह का बदलाव करने से पहले विरासत एवं संरक्षण समिति की मंजूरी लेना आवश्यक है।

1977 से अधिसूचित वक्फ संपत्ति होने का दावा

याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को यह भी बताया कि मस्जिद वर्ष 1977 से अधिसूचित वक्फ संपत्ति है। उन्होंने आरोप लगाया कि दिल्ली वक्फ बोर्ड ने यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाए कि लोगों को मस्जिद में आने-जाने की अनुमति मिलती रहे। याचिकाकर्ता की ओर से पेश दलीलों का मुख्य आधार मस्जिद की कथित संरक्षित स्थिति, उसकी वक्फ संपत्ति के रूप में अधिसूचना और वहां लोगों की पहुंच बनाए रखने की मांग थी।

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