वैभव बेमेतरिहा

रायपुर। छत्तीसगढ़ में भाजपा का नया समीकरण क्या है ? क्या संगठन में उच्च स्तर पर बड़ा बदलाव होने जा रहा है ? क्या इस बदलाव का असर मोदी सरकार से लेकर साय सरकार तक पड़ेगा ? और क्या यह चुनाव से पहले होने वाले बड़े राजनीतिक उलटफेर का कोई नया अनुमान है ? आखिर इतने सारे सवालों को लेकर एकाएक राजनीतिक गलियारों से लेकर तमाम मीडिया पर चर्चा क्यों होने लगी है ? क्या पुख्ता तौर पर कोई संकेत पार्टी की ओर से दिया गया है ? या फिर बात कुछ और ही है..!

भाजपा अक्सर अनुमान से परे फैसलों से चौंकाती रही है. संगठन के नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं तक और राजनीतिक गलियारों से लेकर मीडिया तक के अनुमान कई मौकों पर गलत साबित हुए हैं. चाहे वह पार्टी अध्यक्ष या नई टीम को लेकर हो या फिर सरकार के मुखिया के नाम तक. लेकिन राजनीति में हर अनुमान गलत नहीं होता है. कई बार अफवाह सच भी होते हैं. और ऐसे में प्रदेश में इस समय पर भाजपा संगठन में बदलाव को लेकर जो चर्चा जोरों पर अगर वह सच हो जाए तो चौंकने की जरूरत नहीं है. क्योंकि यह बदलाव वर्तमान के लिए नहीं बल्कि भविष्य के नए समीकरण के लिए अधिक है.

बदलाव क्या होने जा रहा है ?

छत्तीसगढ़ भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष किरण सिंह देव हैं. किरण सिंह देव जगदलपुर से विधायक भी हैं. वे बस्तर अँचल से आने वाले संगठन के सबसे पुराने और जमीनी नेताओं में से एक हैं. सामान्य वर्ग से आने वाले सबसे मजबूत नेताओं में से एक. राज्य में भाजपा की जीत और अरुण साव के उपमुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया था. उनका पहला कार्यकाल पूरा होने के बाद उन्हें दोबारा इस पद रखा गया है. वैसे उनकी चाहत साय सरकार में मंत्री बनने की रही है. फिलहाल सड़क दुर्घटना में घायल होने के बाद से बिस्तर पर हैं. उन्हें पूरी तरह ठीक होने में महीनों लग सकते हैं. ऐसी स्थिति में संगठन को लीड कौन करेगा ? यह चर्चा उनकी पार्टी में कार्यकर्ताओं से लेकर नेताओं तक होने लगी है.

पार्टी के अंदर की इस चर्चा को सोशल मीडिया के जरिए बल तब और मिला जब मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय अचानक शाम को दिल्ली रवाना हुए. रात में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मिले और सुबह-सुबह रायपुर लौट भी आए. उनके अचानक जाने-आने और पार्टी अध्यक्ष से मिलने के इस घटनाक्रम को सोशल मीडिया से लेकर भाजपा की पृष्ठभूमि को समझने वाले पत्रकारों तक इसी रूप में देखा जा रहा है. हालांकि साय और नबीन के बीच मुलाकात में मूल विषय क्या था यह अब तक स्पष्ट रूप से बाहर नहीं आ पाया है. फिर भी कयासों और अनुमानों के साथ अगर इसे प्रदेश संगठन में होने वाले बदवाल के साथ जोड़ा जा रहा है तो यह गलत नहीं होगा. क्योंकि मौजूदा समीकरण इसी ओर इशारा कर रहा है.

नया समीकरण

चर्चा है कि मोदी कैबिनेट का विस्तार होना है. इस विस्तार में छत्तीसगढ़ का कद बढ़ सकता है. माना जा रहा है कि मोदी सरकार में राज्य के कोटे से सामान्य वर्ग से आने वाले एक सांसद को कैबिनेट मंत्री बनाया जाएगा. और मौजूदा केन्द्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू को हटा दिया जाएगा. लेकिन हटाने से पहले ही राज्य में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी जाएगी. यह जिम्मेदारी प्रदेश संगठन की कमान की होगी. ऐसा वर्तमान घटनाक्रम की वजह से नहीं, बल्कि भविष्य में संभावित उलटफेर के मद्देनजर होगी.

उलटफेर क्या हो सकता है इस पर अभी उत्तराखंड या गुजरात की तरह चर्चा करने की जरूरत नहीं. फिलहाल राजनीतिक और सामाजिक समीकरण पर ही केंद्रित रहना सही होगा. दरअसल तोखन साहू राजनीतिक वोट बैंक के लिहाज से सबसे मजबूत समाज से आते हैं. साहू समाज की आबादी राज्य में आदिवासियों के बाद सर्वाधिक है. इस आबादी के वोट बैंक पर भाजपा प्रभाव राज्य गठन के पूर्व से रहा है. राज्य गठन के बाद इस पर प्रभाव भाजपा का बढ़ता ही गया है.

राज्य गठन के बाद छत्तीसगढ़ का पहला भाजपा अध्यक्ष ही साहू समाज से था. राष्ट्रीय नेतृत्व ने सन् 2000 में साहू समाज के जनाधार वाले नेता ताराचंद साहू को अध्यक्ष बनाया था. ओबीसी वर्ग से आने वाले ताराचंद साहू करीब 2 वर्ष तक अध्यक्ष रहे. उनके बाद 2003 ठीक चुनाव से पहले केंद्रीय राज्यमंत्री से इस्तीफा दिलावकर सामान्य वर्ग से आने वाले डॉ. रमन सिंह को अध्यक्ष बनाया गया था. डॉ. रमन सिंह के मुख्यमंत्री बनने के बाद आदिवासी वर्ग से आने वाले दिग्गज नेता नंदकुमार साय 2003 से 2005 तक अध्यक्ष रहे. 2005 से 06 तक आदिवासी नेता शिवप्रताप सिंह अध्यक्ष रहे. 2006 से 2010 तक आदिवासी नेता विष्षुदेव साय अध्यक्ष रहे. 2010 से 2014 तक आदिवासी नेता रामसेवक पैकरा अध्यक्ष रहे. 2014 में विष्णुदेव साय फिर से अध्यक्ष बने. उनके सांसद बनने के बाद धरम लाल कौशिक 2014 से 2019 तक अध्यक्ष रहे. उनके हटने के बाद आदिवासी नेता विक्रम उसेंडी 2019-20 में एक वर्ष के लिए अध्यक्ष रहे. उनके हटते ही 2020 से 22 तक फिर से विष्णुदेव साय को अध्यक्ष बनाया गया. लेकिन 9 अगस्त 2022 को अचानक आदिवासी दिवस के दिन साय को हटाकर चुनाव से ठीक पहले ओबीसी वर्ग और साहू समाज आने वाले पहली बार के सांसद अरुण साव को अध्यक्ष बना दिया गया. अरुण साव के नेतृत्व में पार्टी 2023 का चुनाव लड़ी और 2003 से लेकर 2023 तक के चुनावों में सर्वाधिक 54 सीट लेकर सत्ता में लौटने में कामयाब रही.

2023 के जीत को राजनीतिक गलियारों में साहू समाज की ताकत से भी जोड़कर देखा गया था. कहा गया कि समाज ने पूरी तरह से भाजपा का साथ दिया था. चर्चा ऐसी भी होती रही है कि मुख्यमंत्री बनाने समाज ने साथ दिया. हालांकि ऐसी चर्चा 2018 में जब कांग्रेस की सरकार बनी थी तब हुई थी. तब लोग ताम्रध्वज साहू को लेकर ऐसी चर्चा करते थे. वैसे चर्चा जो भी होती रही हो लेकिन साहू समाज की राजनीतिक भूमिका या ताकत को कम नहीं आंका जा सकता. अरुण साव उपमुख्यमंत्री बने तो वहीं पहली बार सांसद बनने वाले तोखन साहू को मोदी सरकार में केंद्रीय राज्यमंत्री बनाया गया. दोनों ही एक विधानसभा क्षेत्र से आने वाले नेता हैं. तब किसी ने अनुमान भी नहीं लगाया था कि तोखन साहू मोदी सरकार में शामिल होंगे.

मौजूदा वक्त में राज्य और भाजपा में जो समीकरण बन रहा या भविष्य में जो उलटफेर की संभावना जान पड़ती है उसमें तोखन साहू का नाम प्रभावी तौर पर दिखाई पड़ता है. तोखन साहू की छवि सौम्य और पार्टी के लिए चुप-चाप काम करने वाले नेता के तौर पर है. जब 2023 में उन्हें विधानसभा की टिकट नहीं दी गई थी, तो वे आंसू बहाकर चूपचाप पार्टी के लिए काम करते रहे. लेकिन अचानक उन्हें 2024 में लोकसभा की टिकट दी गई तो सब चौंक गए थे. और इससे ज्यादा चकित तो तब हुआ जब वे संघर्षों के बीच जीतकर आए और मोदी सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री बना दिए गए.

और आज जब राज्य में पार्टी संगठन में बदलाव की चर्चा है तो सबसे प्रबल नाम तमाम नेताओं के बीच तोखन साहू का है. तोखन साहू इस चर्चा को खारिज भी नहीं करते. वे कहते हैं कि पार्टी का हर फैसला स्वीकार है. उन्हें जो जिम्मेदारी दी जाएगी वे उसे पूरी ईमानदारी से निभाएंगे. वे सबसे पहले पार्टी के कार्यकर्ता हैं, बाकी सब बाद में. राष्ट्रीय नेतृत्व का जैसा आदेश होगा तत्काल उसे मान लिए जाएगा. उन्हें हमेशा पार्टी हित को सर्वोपरि रखा है. पार्टी का अनुशासन ही शासन है. मैं जो कुछ हूँ पार्टी से हूँ.

बहरहाल नए समीकरण में चर्चा और अनुमान के बीच प्रदेश का संगठन मौजूदा अध्यक्ष ही संभालते रहेंगे या कोई और यह तो समय बताएगा. लेकिन वर्तमान के बाद का भविष्य तो कुछ और ही इशारा कर रहा है. और जो चर्चा में है वो सच न हो इससे इंकार भी फिलहाल नहीं किया जा सकता.

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