कुंदन कुमार/पटना: बिहार की राजनीति में आज का दिन बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार में स्वास्थ्य मंत्री की जिम्मेदारी संभालने के बाद निशांत कुमार आज पहली बार जनसुनवाई कार्यक्रम के जरिए सीधे जनता से रूबरू हो रहे हैं। पटना स्थित जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के प्रदेश कार्यालय में आयोजित इस कार्यक्रम में वे लोगों की शिकायतों को सुन रहे हैं और मौके पर ही उनके समाधान के निर्देश दे रहे हैं।

​पहली बार जनता के बीच ‘सीधी बात’

​आमतौर पर विभागीय बैठकों और कार्यकर्ताओं के संवाद तक सीमित रहने वाले निशांत कुमार के लिए यह पहला मौका है जब वे एक मंत्री के तौर पर आम जनता के साथ बैठकर उनकी समस्याओं का निपटारा कर रहे हैं। इस जनसुनवाई को लेकर जेडीयू कार्यालय में सुबह से ही भारी भीड़ उमड़ी हुई है। प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए लोग अपनी स्वास्थ्य संबंधी शिकायतों, स्थानीय समस्याओं और प्रशासनिक सुधार के मुद्दों को लेकर मंत्री के पास पहुंच रहे हैं।

​वरिष्ठ मंत्रियों का मिला साथ

​जनसुनवाई के इस कार्यक्रम में निशांत कुमार अकेले नहीं हैं। उनके साथ बिहार सरकार के वरिष्ठ मंत्री रत्नेश सादा और दामोदर रावत भी मौजूद हैं। तीनों मंत्रियों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि सरकार जनता की समस्याओं को लेकर कितनी गंभीर है। रत्नेश सादा और दामोदर रावत अपने अनुभवों के आधार पर निशांत कुमार का सहयोग कर रहे हैं ताकि जन शिकायतों का त्वरित और प्रभावी निपटान सुनिश्चित किया जा सके।

​बदलती भूमिका और बढ़ती सक्रियता

​स्वास्थ्य मंत्री का पद संभालने के बाद से ही निशांत कुमार की कार्यशैली में बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। प्रशासनिक कार्यों में उनकी सक्रियता पहले के मुकाबले काफी बढ़ गई है। हाल ही में उन्होंने बिहार की एक विस्तृत यात्रा भी की थी, जिसमें उन्होंने न केवल कार्यकर्ताओं का उत्साहवर्धन किया, बल्कि आम जनता को संबोधित कर सरकार की योजनाओं से अवगत भी कराया था। विशेषज्ञों का मानना है कि जनसुनवाई में उनकी भागीदारी उनके बढ़ते राजनीतिक कद और जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता को और मजबूत करेगी।

​सरकार का जनता से सीधा जुड़ाव

​राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जेडीयू द्वारा आयोजित यह जनसुनवाई कार्यक्रम असल में सरकार और जनता के बीच की दूरी को कम करने की एक सोची-समझी रणनीति है। स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील विभाग के मंत्री का खुद जनता के बीच जाकर उनकी पीड़ा सुनना, राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक सकारात्मक संदेश देता है। इसका उद्देश्य न केवल समस्याओं का समाधान करना है, बल्कि शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही को भी बढ़ावा देना है।