भुवनेश्वर: जनकल्याणकारी योजनाओं पर सरकारी खर्च लगातार बढ़ रहा है। लोकलुभावन योजनाओं से सरकारें भले ही वाहवाही लूट रही हों, लेकिन मुफ्त की रेवड़ियों पर बढ़ते खर्च को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। 16वें वित्त आयोग (16th Finance Commission) का रुख भी इस मुद्दे पर चर्चा में है, जिसमें राज्यों को अपनी वित्तीय क्षमता से अधिक खर्च न करने की चेतावनी दी गई है।

सुभद्रा योजना और बढ़ता वित्तीय बोझ

ओडिशा में भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद ‘सुभद्रा योजना’ राज्य की प्रमुख महिला कल्याण योजना के रूप में उभरी है। इस योजना के तहत पात्र महिलाओं को हर साल 10,000 रुपये की वित्तीय सहायता दी जा रही है। वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में सुभद्रा योजना के लिए 10,145 करोड़ रुपये का बड़ा आवंटन किया गया है।

एक करोड़ से अधिक लाभार्थी महिलाओं तक इसका लाभ पहुँचने के कारण हर साल राज्य का खर्च तेजी से बढ़ रहा है। केवल सुभद्रा योजना ही नहीं, बल्कि किसानों के लिए एमएसपी और इनपुट सहायता जैसी कई अन्य योजनाओं में भी भारी राशि खर्च की जा रही है।

दीर्घकालिक विकास पर असर की आशंका

अर्थशास्त्रियों के अनुसार, तात्कालिक सामाजिक सुरक्षा और लोगों को वित्तीय मदद देना जरूरी हो सकता है, लेकिन अगर यह खर्च राज्य के राजस्व से अधिक हो जाए, तो बुनियादी ढांचे पर इसका बुरा असर पड़ता है। यदि सड़क, सिंचाई, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार सृजन जैसे पूंजीगत क्षेत्रों में पर्याप्त निवेश नहीं किया गया, तो भविष्य में राज्य का दीर्घकालिक विकास प्रभावित हो सकता है।

राजस्व वृद्धि और कर्ज का बढ़ता खतरा

राज्य सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपना राजस्व बढ़ाना है। यदि सरकारी खर्च जिस गति से बढ़ रहा है, उस अनुपात में राजस्व संग्रह नहीं बढ़ता, तो राज्य पर आर्थिक दबाव गहरा सकता है। प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव और कृषि-उद्योग क्षेत्रों की वृद्धि दर को देखते हुए, यदि मुफ्त योजनाओं पर अधिक खर्च जारी रहा, तो ओडिशा को एक बार फिर कर्ज पर अत्यधिक निर्भर होना पड़ सकता है।

राजनीतिक लोकप्रियता हासिल करने और जनकल्याण सुनिश्चित करने के साथ-साथ राज्य के राजस्व को बढ़ाने तथा दीर्घकालिक पूंजी निवेश के बीच संतुलन बनाए रखना वर्तमान सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m