कृष्ण कुमार सैनी, चंडीगढ़। दक्षिणी हरियाणा की राजनीति में इन दिनों केवल नेताओं की नियुक्तियां नहीं हो रहीं, बल्कि इनके साथ सत्ता और संगठन के नए समीकरण भी चर्चा में आ गए हैं। सवाल यह है कि क्या भाजपा अहीरवाल में अपनी राजनीति का दायरा बढ़ाते हुए राव इंद्रजीत सिंह के प्रभाव को संतुलित करने की तैयारी में है? पिछले कुछ समय में हुई तीन अहम नियुक्तियों ने इस चर्चा को और हवा दे दी है।
दरअसल, भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया तंत्र में सिद्धार्थ यादव की नियुक्ति, उनकी मां एवं पूर्व सांसद डॉ. सुधा यादव को कर्नाटक का राज्यपाल बनाया जाना और अब अनुरुध यादव को केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल के कार्यालय में ओएसडी (विशेष कार्य अधिकारी) की जिम्मेदारी मिलना, इन तीनों घटनाओं को अहीरवाल के राजनीतिक चश्मे से देखा जा रहा है।
इन नियुक्तियों की खास बात इनके अलग-अलग राजनीतिक और प्रशासनिक क्षेत्रों से जुड़ा होना है। सिद्धार्थ यादव को पार्टी के मीडिया तंत्र में भूमिका मिली है, डॉ. सुधा यादव को संवैधानिक जिम्मेदारी सौंपी गई है और अनुरुध यादव केंद्रीय मंत्री के कार्यालय से जुड़े हैं। भाजपा के इन फैसलों को क्षेत्र में नए नेतृत्व और प्रभाव के विस्तार की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
पुराने सियासी समीकरणों में नए किरदार
इन नियुक्तियों की चर्चा इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि संबंधित परिवारों के राजनीतिक रिश्ते राव इंद्रजीत सिंह के साथ हमेशा सहज नहीं रहे हैं। पूर्व चेयरमैन अरविंद यादव और राव इंद्रजीत के बीच लंबे समय से राजनीतिक दूरी रही है। डॉ. सुधा यादव और राव के संबंधों को लेकर भी समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं।
ऐसे में अनुरुध यादव की केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल के कार्यालय में नियुक्ति को महज एक प्रशासनिक फैसला मानकर छोड़ना राजनीतिक हलकों को पर्याप्त नहीं लग रहा। इसे अहीरवाल में नए संपर्कों और नए राजनीतिक केंद्रों के उभरने से जोड़कर देखा जा रहा है।
हालांकि, इन नियुक्तियों के पीछे राव इंद्रजीत सिंह के प्रभाव को कम करने की कोई आधिकारिक रणनीति सामने नहीं आई है। लेकिन लगातार सामने आ रहे घटनाक्रमों ने इस सवाल को जरूर जन्म दिया है कि क्या भाजपा दक्षिणी हरियाणा में किसी एक नेता पर निर्भरता कम करना चाहती है?
मनोहर लाल के साथ पुराने मतभेद भी चर्चा में
राव इंद्रजीत सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल के बीच राजनीतिक मतभेद किसी से छिपे नहीं रहे हैं। अब अनुरुध यादव को मनोहर लाल के कार्यालय में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलने के बाद इस नियुक्ति के सियासी मायने भी निकाले जा रहे हैं।
14 अक्टूबर को गुरुग्राम में आयोजित विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस का कार्यक्रम भी इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में चर्चा का हिस्सा बना। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, स्वामी धर्मदेव और सीकरी सहित कई प्रमुख लोग कार्यक्रम में मौजूद थे। इसी मंच से राव इंद्रजीत सिंह की कुछ टिप्पणियां राजनीतिक चर्चा का विषय बनीं। उन्होंने स्वामी धर्मदेव से राजनीति में आने की उनकी पूर्व इच्छा और उसके परिणामों को लेकर सवाल किया था।
राव की चाय पार्टी भी बनी सियासी चर्चा का केंद्र
दूसरी तरफ, राव इंद्रजीत सिंह भी अपने राजनीतिक संपर्कों को सक्रिय रखने में जुटे दिखाई दे रहे हैं। स्मृति ईरानी की बैठक के बाद विधायकों के साथ उनकी चाय पर मुलाकात को इसी राजनीतिक गतिविधि के रूप में देखा गया।
हालांकि, इस बार उनकी चाय पार्टी में पहले की तुलना में कम विधायकों की मौजूदगी चर्चा का विषय रही। रेवाड़ी के विधायक लक्ष्मण यादव की अनुपस्थिति को भी राजनीतिक गलियारों में अलग-अलग नजरिये से देखा गया।
हरियाणा की राजनीति में चाय पर होने वाली मुलाकातें अक्सर सामान्य मेल-मिलाप से आगे का संदेश देती हैं। कौन पहुंचा, कौन नहीं पहुंचा और किस नेता की मौजूदगी कितनी रही, इन सबके राजनीतिक अर्थ तलाशे जाते हैं। ऐसी बैठकों के जरिए नेता अपने संपर्कों और संगठन के भीतर अपनी सक्रियता का भी संकेत देते हैं।
राव नरबीर सिंह भी क्षेत्र के अहम राजनीतिक चेहरे
अहीरवाल की बदलती राजनीति में कैबिनेट मंत्री राव नरबीर सिंह की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। क्षेत्र में उनका अपना राजनीतिक प्रभाव है। ऐसे में दक्षिणी हरियाणा में भाजपा के भीतर एक से अधिक प्रभावशाली चेहरों की सक्रियता को संगठनात्मक संतुलन के नजरिये से भी देखा जा रहा है।
राव इंद्रजीत सिंह कई बार सार्वजनिक मंचों से राजनीति से संन्यास लेने की बात कह चुके हैं। लेकिन राजनीतिक गलियारों में एक चर्चा यह भी है कि राजनीति से विदाई का फैसला हमेशा नेता की अपनी इच्छा से ही नहीं होता। कभी-कभी बदलते राजनीतिक समीकरण भी किसी नेता की भूमिका और प्रभाव को सीमित कर देते हैं।
अहीरवाल की राजनीति में आगे क्या?
पूरे घटनाक्रम को जोड़कर देखें तो भाजपा के सामने दक्षिणी हरियाणा में नेतृत्व का दायरा बढ़ाने और अलग-अलग राजनीतिक चेहरों को महत्व देने का विकल्प दिखाई देता है। दूसरी तरफ राव इंद्रजीत सिंह के लिए अपने पुराने राजनीतिक प्रभाव और विधायकों के साथ संपर्क बनाए रखना अहम है।
फिलहाल तीन नियुक्तियां, मनोहर लाल के कार्यालय में नई जिम्मेदारी, गुरुग्राम का राजनीतिक मंच और राव की चाय पार्टी अहीरवाल की सियासत में नई बहस छेड़ चुके हैं।
अब असली सवाल यही है कि भाजपा अहीरवाल में राव इंद्रजीत सिंह के प्रभाव को संतुलित करने के लिए नए राजनीतिक केंद्र विकसित कर रही है या फिर यह पार्टी की व्यापक संगठनात्मक रणनीति का हिस्सा है? जवाब आने वाले समय में पार्टी के फैसलों और नेताओं के बीच राजनीतिक तालमेल से मिलेगा। लेकिन इतना तय है कि अहीरवाल में सियासी बिसात पर अब केवल एक चेहरे की चर्चा नहीं हो रही।
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