(सुधीर दंडोतिया की कलम से) 

यह तो साजिश है..बड़ी साजिश

चुनाव समय में अफवाहों का माहौल गर्म हो रहा है. प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव और पूर्व मुख्यमंत्री इकबाल सिंह बैंस पर ईडी के छापे की खबर भी चंद मिनटों में आग की तरफ फैली. हालांकि यह खबर भी महज एक अफवाह साबित हुई. लेकिन, तब तक मिशन तो कामयाब हो ही गया था. पड़ताल में यह बात सामने आई कि अफवाह भी मंत्रालय से उपजी थी. कुछ ही देर में सुर्खियों की ऐसी खबर जिसका कोई आधार ही नहीं था. सूत्रों की माने तो यह भी एक राजनीतिक साजिश का हिस्सा थी. जो किसी विपक्षी पार्टी की नहीं. एक सियासी गुट के अफसरों के साथ नेताओं को डेमो कहे तो यह अचरज की बात नहीं. वैसे रियासत और सियासत की बाजी में प्यादों का ही अहम होता है.

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अरबों के मास्टर प्लान का मास्टर माइंड कौन

भोपाल के नए सिरे से मास्टर प्लान को लेकर एक सुपर हाईक्लास लॉबी फिर एक्टिव हो गई है. यह वही लॉबी है जिसने कांग्रेस सरकार में तैय़ार किए गए मास्टर प्लान में मनचाहे प्रावधान कराए थे. अरबों की बेशकीमती जमीनों को गड़बड़ियों के प्रावधान भी जब सार्वजनिक हुए तो सत्ता परिवर्तन के बाद सरकार ने भी इन्हें सुधारा. बिल्डर, रसूखदार, कुछ सत्ताधारी पार्टी के नेता और जमीनों के बड़े दलालों को छोड़कर सारे शहर समेत अर्बन एक्सपर्ट ने मास्टर प्लान को सहारा. लेकिन, मंत्री जी के फरमान के बाद अब यह लागू नहीं होगा. बताया जा रहा है कि एक बार फिर वही लॉबी सक्रिय हो गई है जिसने कांग्रेस शासन काल में मास्टर प्लान को निज स्वार्थ का जरिया बनाया था. बिल्डरों के एक संगठन और एक बड़े कद के नेता एक बार फिर एक्टिव हो गए हैं. कैचमेंट की जमीन, केरवा, कलियासोत, शहर की बेशकीमती जमीनों के मास्टर माइंड.

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10 दिन तक सक्रिय नहीं हुए थे साथी

बात मध्य प्रदेश की एक महत्वपूर्ण लोकसभा सीट की है. जहां विधानसभा का चुनाव हारने वाले नेता को सांसदी का टिकट क्या मिला. साथियों ने दूरियां सी बना लीं. साथी नेताओं ने अपनी विधानसभाओं में न प्रचार-प्रसार की तैयारी की और न ही अन्य किसी तरह की प्लानिंग. यह बात प्रदेश कार्यालय तक पहुंची तो जिला संगठन को सक्रिय किया गया और अलग-अलग जनप्रतिनिधियों के साथ बैठकें हुईं. चार-छह दिन तक लगातार चली बैठकों के साथ अब पूरा संगठन, विधायक चुनावी तैयारी में जुटे हुए नजर आ रहे हैं.

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गलियों के सर्वे से बीजेपी में अति-उत्साह

चुनाव के बीच सर्वे तो कई होते हैं, लेकिन इस बार सत्ताधारी पार्टी ने गली-मोहल्ले में लोगों से चर्चा कर मन टटोलने का प्रयास किया. पार्टी के नेता अलग-अलग वार्डों की काॅलोनियों में पहुंचे और लोगों के मन की बात जानी तो अति-उत्साह में आ गए. संगठन स्तर पर इस पर मंथन भी हुआ. गलियों के सर्वे से पार्टी खुश जरूर हुई, लेकिन सभी को नसीहत यही दी गई कि ओवर काॅन्फ्रीडेंस में नहीं रहना है. चुनाव तक इसी तरह जुटे रहना है.

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कांग्रेस को 2014 की घटना का डर और कट गया टिकट

कांग्रेस को मध्यप्रदेश की दूसरी लिस्ट जारी करने में पसीने छूट गए केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक के 2 दिन बाद कांग्रेस के टिकट आए,भोपाल से टिकट मिल अरुण श्रीवास्तव को लेकिन टिकट की दौड़ में सबसे आगे थे एक पूर्व अधिकारी लेकिन आखिरी समय में कांग्रेस नेताओं को 2014 भिंड की घटना याद आई और डर सताया की टिकट मिलने के बाद नेताजी दूसरी पार्टी में ना पहुंच जाए जो नेता पूर्व अधिकारी के सिफारिश कर रहे थे उनसे पूछा गया आप जिम्मा लेते हैं उन्होंने हाथ खड़े कर दिया और फिर अरुण श्रीवास्तव को टिकट देने पर सहमति बनी.

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गांधी परिवार का करीबी होने के चलते बच गया टिकट

मध्यप्रदेश कांग्रेस के एक बड़े आदिवासी नेता का नाम दूसरे लिस्ट में बड़ी जद्दोजहद के बाद आ गया लेकिन इसके लिए उन्हें 3 दिन तक दिल्ली में डेरा डालना पड़ा क्योंकि मध्यप्रदेश कांग्रेस की युवा पीढ़ी ने उनके साथ खेल कर दिया था,जैसे ही नेता जी को भनक लगी टिकट फंस गया है नेताजी दिल्ली पहुंच गए और गांधी परिवार का करीबी होने का फायदा उठाते हुए आखिरी बार चुनाव लड़ने का हवाला देकर टिकट ले आए.

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