अमेरिका के लास वेगास में गिरफ्तार किए गए दिल्ली-NCR और हरियाणा के वांछित गैंगस्टर हिमांशु भाऊ (gangster Himanshu Bhau) और उसके सहयोगी नीरज फरीदपुरिया को भारत लाने की प्रक्रिया तेज हो गई है। भारतीय एजेंसियां दोनों को देश वापस लाने के लिए आधिकारिक कार्रवाई में जुट गई हैं। इसके लिए पारंपरिक लंबी प्रत्यर्पण प्रक्रिया के बजाय फास्ट-ट्रैक डिपोर्टेशन का विकल्प अपनाने की तैयारी की जा रही है। दोनों की गिरफ्तारी के बाद भारतीय एजेंसियों का ध्यान अब उन्हें जल्द भारत लाने की प्रक्रिया पूरी करने पर है। फास्ट-ट्रैक डिपोर्टेशन के जरिए उनकी वापसी की संभावनाओं पर काम किया जा रहा है, ताकि लंबी कानूनी प्रक्रिया से बचते हुए नियमानुसार कार्रवाई आगे बढ़ाई जा सके।
फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल का आरोप
हरियाणा पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, हिमांशु भाऊ ने अमेरिका में प्रवेश पाने के लिए कथित तौर पर फर्जी पहचान और जाली दस्तावेजों का सहारा लिया था। भारतीय एजेंसियों ने अमेरिकी अधिकारियों के सामने इस मामले में तथ्यों को गलत तरीके से पेश करने और आव्रजन धोखाधड़ी से जुड़े पहलुओं को रखा है। एजेंसियों की कोशिश है कि यदि अमेरिकी कानूनों के तहत निर्वासन का आधार बनता है, तो पारंपरिक प्रत्यर्पण प्रक्रिया के बजाय डिपोर्टेशन के माध्यम से उसकी भारत वापसी कराई जा सके।
अमेरिका जाएगी स्पेशल एस्कॉर्ट टीम
सूत्रों के मुताबिक, दोनों आरोपियों को भारत वापस लाने की प्रक्रिया के तहत एक विशेष एस्कॉर्ट टीम अमेरिका भेजने की तैयारी की जा रही है। यह टीम संबंधित अमेरिकी अधिकारियों के साथ समन्वय कर आगे की प्रक्रिया में शामिल हो सकती है। हालांकि, डिपोर्टेशन की प्रक्रिया अमेरिकी अधिकारियों के निर्णय और लागू कानूनों के अधीन होगी। अभी यह स्पष्ट होना बाकी है कि दोनों आरोपियों को किस तारीख तक भारत लाया जा सकेगा।
ऐसे नाकाम हुई असाइलम की कथित कोशिश
आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, भारत में इंटरपोल की नोडल एजेंसी केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने हिमांशु भाऊ के खिलाफ हरियाणा और दिल्ली पुलिस में दर्ज मामलों का विवरण अमेरिकी अधिकारियों को उपलब्ध कराया। इसके साथ ही उसकी आपराधिक पृष्ठभूमि से संबंधित जानकारी भी साझा की गई। सूत्रों का कहना है कि इस जानकारी का उद्देश्य अमेरिकी अधिकारियों के सामने दोनों आरोपियों की पहचान और उनके खिलाफ दर्ज मामलों की स्थिति स्पष्ट करना था। हालांकि, असाइलम आवेदन खारिज किए जाने के दावे और उसके आधार की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी आवश्यक है।
अमेरिकी अधिकारियों को सौंपे गए बायोमेट्रिक्स और आपराधिक रिकॉर्ड
सूत्रों के मुताबिक, भारत सरकार ने अमेरिकी होमलैंड सिक्योरिटी और इमिग्रेशन अधिकारियों के साथ दोनों आरोपियों के बायोमेट्रिक विवरण और उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों का रिकॉर्ड साझा किया। बताया गया है कि बायोमेट्रिक विवरण के मिलान और रेड कॉर्नर नोटिस से संबंधित जानकारी के आधार पर अमेरिकी एजेंसियों ने दोनों की पहचान की पुष्टि करते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई की। हालांकि, इन जानकारियों के आधार पर असाइलम आवेदन खारिज होने और गिरफ्तारी के बीच के आधिकारिक घटनाक्रम की पुष्टि संबंधित अमेरिकी एजेंसियों के बयान से ही हो सकेगी।
CBI और पुलिस के रिकॉर्ड की अहम भूमिका
भारत में CBI इंटरपोल के साथ समन्वय करने वाली नोडल एजेंसी है। इंटरपोल के माध्यम से सदस्य देशों की कानून प्रवर्तन एजेंसियां वांछित व्यक्तियों की पहचान और उनके बारे में जानकारी साझा कर सकती हैं। रेड कॉर्नर नोटिस किसी व्यक्ति की पहचान और उसे तलाशने के लिए अंतरराष्ट्रीय पुलिस सहयोग का माध्यम है; यह अपने आप में अंतरराष्ट्रीय गिरफ्तारी वारंट नहीं होता। हरियाणा के रोहतक जिले के रिटौली गांव का रहने वाला 23 वर्षीय हिमांशु भाऊ का असली नाम हिमांशु रिटौलिया है। आरोप है कि उसने कम उम्र में ही अपराध की दुनिया में कदम रखा और धीरे-धीरे दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा तथा पंजाब में सक्रिय एक अंतरराष्ट्रीय आपराधिक गिरोह का सरगना बन गया। पुलिस के अनुसार, उसके गिरोह के सदस्य कथित तौर पर हत्या, रंगदारी और धमकी जैसी वारदातों को अंजाम देते थे, जबकि हिमांशु विदेश में रहकर नेटवर्क संचालित करता था। उसके खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, रंगदारी और आपराधिक धमकी सहित कुल 64 मामले दर्ज होने की जानकारी दी गई है। इनमें से अधिकतर मामले हरियाणा में दर्ज बताए जाते हैं।
17 साल की उम्र में अपराध की दुनिया में रखा कदम
रिपोर्ट के मुताबिक, हिमांशु भाऊ की आपराधिक गतिविधियों की शुरुआत वर्ष 2019 में हुई, जब वह करीब 17 साल का था। उस समय पढ़ाई के दौरान उस पर रोहतक की एक सब्जी मंडी में रंगदारी वसूलने के लिए गोलीबारी करने का आरोप लगा था। इस मामले में पकड़े जाने के बाद नाबालिग होने के कारण उसे हिसार स्थित किशोर सुधार गृह भेजा गया था। बताया जाता है कि किशोर सुधार गृह में रहते हुए वह 17 अन्य बंदियों के साथ दीवार तोड़कर फरार हो गया था। इसके बाद से पुलिस उसे दोबारा गिरफ्तार नहीं कर सकी। हालांकि, इस घटनाक्रम और उससे जुड़े मामलों के विवरण की पुष्टि संबंधित पुलिस रिकॉर्ड से की जानी चाहिए।
विदेश पहुंचकर गिरोह का संचालन करने का आरोप
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022 में हिमांशु कथित तौर पर फर्जी पासपोर्ट का इस्तेमाल कर भारत से फरार हो गया था। बताया जाता है कि वह पहले पुर्तगाल गया और बाद में अमेरिका पहुंचा। जांच एजेंसियों के मुताबिक, विदेश में रहने के दौरान उसने अपने गिरोह का नेटवर्क बढ़ाने और नए शूटरों को शामिल करने की कोशिश की। उसके गिरोह की गतिविधियां दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और पंजाब समेत कई क्षेत्रों में फैली होने का आरोप है। पुलिस का दावा है कि विदेश में रहते हुए भी वह अपने सहयोगियों के माध्यम से आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देने की साजिश रचता था।
‘भाऊ’ नाम से हुई पहचान
हिमांशु को उसके गिरोह के सदस्यों ने कथित तौर पर ‘भाऊ’ उपनाम दिया था। इसका अर्थ बड़ा भाई होता है। समय के साथ यही नाम उसकी पहचान बन गया। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, उसका नेटवर्क कई राज्यों में सक्रिय रहा है और उसके खिलाफ विभिन्न आपराधिक मामलों में जांच की गई है।
अमेरिका में गिरफ्तारी के बाद भारत लाने की तैयारी
अमेरिका के लास वेगास में हिमांशु भाऊ और उसके सहयोगी नीरज फरीदपुरिया की गिरफ्तारी के बाद भारतीय एजेंसियां उन्हें वापस लाने की प्रक्रिया में जुटी हैं। दोनों को भारत लाने के लिए प्रत्यर्पण के बजाय फास्ट-ट्रैक डिपोर्टेशन की संभावनाओं पर काम किए जाने की जानकारी सामने आई है।
प्रत्यर्पण और डिपोर्टेशन में क्या है अंतर?
प्रत्यर्पण (एक्सट्रैडिशन) में एक देश दूसरे देश के अनुरोध पर किसी आरोपी या वांछित व्यक्ति को कानूनी प्रक्रिया के तहत सौंपता है। इसके विपरीत, डिपोर्टेशन आव्रजन कानूनों के तहत किसी विदेशी नागरिक को देश से बाहर भेजने की प्रक्रिया है। यदि किसी व्यक्ति के अमेरिका में प्रवेश या वहां रहने के संबंध में धोखाधड़ी और फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल के पर्याप्त आधार मिलते हैं, तो अमेरिकी अधिकारी अपने कानूनों के अनुसार निर्वासन की कार्रवाई पर विचार कर सकते हैं। हालांकि, डिपोर्टेशन अपने आप में प्रत्यर्पण का विकल्प नहीं है और इसकी प्रक्रिया संबंधित परिस्थितियों तथा कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करती है।
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