Dharm Desk – ज्योतिष में राहु और केतु को ऐसे छाया ग्रह माना जाता है. जो व्यक्ति के जीवन में अचानक बदलाव, उलझन, अवसर और आध्यात्मिक झुकाव जैसे पहलुओं को प्रभावित करते है. सामान्यतः इनका आकलन जन्म कुंडली के आधार पर किया जाता है, लेकिन हस्त रेखा शास्त्र में यह मान्यता प्रचलित है कि हथेली की बनावट, रेखाएं और परवत भी इनके प्रभाव की झलक दे सकते है. यही कारण है कि कई ज्योतिष विशेषज्ञ हाथ देखकर भी राहु-केतु के असर को समझने का प्रयास करते हैं.

हथेली में राहु-केतु के संकेत कैसे देखे जाते हैं

हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार हथेली का हर हिस्सा किसी न किसी ग्रह या ऊर्जा से जुड़ा माना जाता है. इसमें राहु और केतु का स्थान स्थिर बिंदु के रूप में नहीं बल्कि एक क्षेत्र के रूप में देखा जाता है. हथेली का मध्य भाग, जो शनि क्षेत्र और कलाई के बीच पड़ता है. उसे राहु से संबंधित है. वहीं कलाई के ऊपर का निचला हिस्सा, जहां से प्रमुख रेखाएं आरंभ होती हैं. उसे केतु का क्षेत्र है. यह भी कहा जाता है कि ये दोनों क्षेत्र व्यक्ति के जीवन में अचानक होने वाली घटनाओं और कर्म से जुड़े परिणामों को दर्शाते हैं. इसलिए इन स्थान की बनावट और रेखाओं का स्वरूप विशेष महत्व रखता है.

राहु के शुभ और अशुभ संकेत

हथेली के मध्य भाग को यदि साफ, संतुलित और बिना अधिक कटाव के देखा जाए, तो इसे सकारात्मक संकेत माना जाता है. ऐसी स्थिति में व्यक्ति चुनौतियों के बीच अवसर खोजने की क्षमता रखता है और अचानक लाभ मिलने की संभानावएं भी बनती हैं. इसके विपरीत यदि इस हिस्से में जाल जैसी रेखाएं, अधिक कटाव या अव्यवस्थित निशान दिखाई दें, तो इसे राहु के अशुभ प्रभा व से जोड़ा जाता है. इस स्थिति में व्यक्ति को निर्णय लेने में भ्रम, आर्थिक अस्थिरता या मानसिक तनाव जैसी स्थितियों का समना करना पड़ सकता है.

केतु का क्षेत्र और उसके हथेली में संकेत

केतु का संबंध आध्यात्मिकता, अंतर्ज्ञान और पूर्व कर्मों से जोड़ा जाता है. कलाई के ऊपर का क्षेत्र यदि संतुलित और स्पष्ट हो, तो यह व्यक्ति में गहरी सोच, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक झुकाव को दर्शाता है. ऐसे लोग अक्सर अंदरूनी समझ के आधार पर फैसले लेने की क्षता रखते है. दूसरी ओर, यदि इस स्थान पर रेखाएं उलझी हुई हों या दबाव जैसा प्रतीत हो, तो यह मानसिक असंतुलन, असमंसज या दिशा की कमी का संकेत भी होता है.