रायपुर। फैमिली कोर्ट रायपुर ने दो नाबालिग बच्चों की अभिरक्षा अपने पक्ष में दिए जाने की मांग करने वाले पिता की याचिका खारिज कर दी है। चतुर्थ अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश विवेक कुमार तिवारी की अदालत ने माना कि बच्चों का सर्वोत्तम हित और कल्याण पिता की बजाय मां की अभिरक्षा में है। हालांकि कोर्ट ने पिता को बच्चों से मिलने का अधिकार बरकरार रखा है। इस मामले में प्रतिवादिनी की ओर से अधिवक्ता विकास गुप्ता ने पैरवी की।

अदालत ने आदेश दिया कि पिता प्रत्येक रविवार को सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक दोनों बच्चों से मिल सकेंगे। इस दौरान मां को किसी भी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न नहीं करने का निर्देश दिया गया है। कोर्ट ने दोनों पक्षों को अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करने का आदेश दिया।
मामला सी.एम.सी. नंबर 207/2024 का है। पिता भूपेन्द्र सिंह चौहान ने संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 की धारा 25 के तहत आवेदन प्रस्तुत कर अपनी बेटी समृद्धि चौहान और बेटे सुलेख सिंह चौहान की अभिरक्षा मांगी थी। अदालत ने 20 अगस्त 2026 को फैसला सुनाते हुए आवेदन निरस्त कर दिया।
2014 में हुई थी शादी, 2023 से अलग रह रहे दंपती
कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक भूपेन्द्र सिंह चौहान और अपूर्वा चौहान का विवाह 28 मार्च 2014 को रायपुर के मित्तल भवन, समता कॉलोनी में हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। दोनों ने कुछ वर्षों तक साथ दांपत्य जीवन बिताया। उनकी बेटी समृद्धि का जन्म 6 फरवरी 2016 को विशाखापट्टनम में हुआ, जबकि बेटे सुलेख सिंह का जन्म 4 सितंबर 2019 को रायपुर में हुआ।
दोनों के बीच विवाद के बाद वर्ष 2023 से पति-पत्नी अलग रह रहे हैं और बच्चे मां के साथ रह रहे हैं।
पिता ने कहा- बच्चों की बेहतर देखभाल कर सकता हूं
पिता की ओर से अदालत में कहा गया कि वह बच्चों का प्राकृतिक संरक्षक है और सेवानिवृत्त होने के कारण बच्चों की देखभाल के लिए उसके पास पर्याप्त समय है। उसने बताया कि वह भारतीय नौसेना में सेवा दे चुका है और वर्तमान में पेंशन प्राप्त करता है। इसके अलावा ग्राफिक्स के काम से भी आय होने की बात अदालत के सामने रखी गई।
पिता का तर्क था कि मां नौकरी करती है और लंबे समय तक काम पर रहने के कारण बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे सकती। उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी बच्चों के पालन-पोषण और भविष्य को लेकर सक्षम नहीं है।
उसका आरोप था कि पत्नी उसके बेटे सुलेख को अपनी बहन को गोद देने की बात करती थी, जिसके कारण दोनों के बीच विवाद हुआ। पिता ने यह भी कहा कि वह बच्चों को अपने पास रखकर उनकी पढ़ाई और भविष्य की बेहतर व्यवस्था करना चाहता है।
मां ने पति पर लगाए प्रताड़ना के आरोप
पत्नी ने पिता के आरोपों को खारिज करते हुए अदालत में अलग पक्ष रखा। उसने आरोप लगाया कि पोर्ट ब्लेयर में रहने के दौरान पति उसके साथ मारपीट और गाली-गलौज करता था। उसने यह भी आरोप लगाया कि पति शराब के नशे में उसके साथ दुर्व्यवहार करता और बच्चों के सामने भी उसे प्रताड़ित करता था।
पत्नी के अनुसार, इन परिस्थितियों से परेशान होकर वह अपनी और बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए मायके चली गई थी। उसने कहा कि बच्चों को लेकर उसका उद्देश्य उन्हें सुरक्षित वातावरण और बेहतर भविष्य देना था।
उसने अदालत को बताया कि वह नौकरी करती है और इसके बावजूद बच्चों की पढ़ाई, पालन-पोषण और दैनिक जरूरतों का ध्यान रख रही है। उसने यह भी कहा कि पिता बच्चों से मिलने या उनका हालचाल जानने के लिए नियमित रूप से प्रयास नहीं करता रहा।
महिला थाने में हुई थी काउंसलिंग
रिकॉर्ड के अनुसार, पति-पत्नी के बीच विवाद के बाद मामला महिला थाना रायपुर तक भी पहुंचा। दोनों पक्षों की काउंसलिंग की गई। पत्नी ने अदालत में कहा कि काउंसलिंग के दौरान उसने बच्चों को अपने साथ रखने की इच्छा जताई थी।
अदालत के समक्ष यह तथ्य भी आया कि एक समय दोनों बच्चे पिता के पास रहे थे और बाद में महिला थाना की प्रक्रिया के बाद मां को सौंपे गए।
पिता ने बच्चों से लंबे समय से मुलाकात नहीं की
अदालत ने साक्ष्यों और दोनों पक्षों के बयानों का विस्तार से परीक्षण किया। पिता ने अपने बयान में स्वीकार किया कि वह लंबे समय से बच्चों से नियमित रूप से नहीं मिला है। उसने बच्चों से मिलने के कुछ प्रयास करने की बात कही, लेकिन अदालत में पत्नी से बच्चों के बारे में नियमित पूछताछ नहीं करने और बच्चों से नहीं मिलने देने के संबंध में पुलिस या अन्य स्तर पर शिकायत नहीं करने की बात भी सामने आई।
अदालत ने इन परिस्थितियों को पिता की ओर से बच्चों की अभिरक्षा की मांग पर विचार करते समय महत्वपूर्ण माना।
कोर्ट ने यह भी देखा कि मां के साथ रहने के दौरान बच्चे उसकी देखरेख में रह रहे हैं और उनकी शिक्षा जारी है। मां स्वयं नौकरी कर रही है और बच्चों की देखभाल कर रही है।
सिर्फ आर्थिक रूप से सक्षम होना कस्टडी का आधार नहीं
पिता ने अपनी आर्थिक स्थिति को भी बच्चों की अभिरक्षा के पक्ष में महत्वपूर्ण आधार बताया था। अदालत ने माना कि पिता की आर्थिक स्थिति मां की तुलना में बेहतर है, लेकिन केवल आर्थिक रूप से अधिक सक्षम होना बच्चों की कस्टडी दिए जाने के लिए पर्याप्त कारण नहीं है।
अदालत ने कहा कि अभिरक्षा के मामलों में सबसे पहले बच्चों के सर्वोत्तम हित और कल्याण को देखा जाना चाहिए। माता-पिता में से कौन आर्थिक रूप से ज्यादा सक्षम है, यह अकेला निर्णायक आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि पिता को पहले से बच्चों के लिए भरण-पोषण राशि देने का आदेश है।
प्राकृतिक संरक्षक होने का अधिकार भी अंतिम नहीं
अदालत ने हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 6 का उल्लेख करते हुए कहा कि सामान्य स्थिति में पांच वर्ष की उम्र के बाद पिता को प्राकृतिक संरक्षक माना जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर मामले में बच्चों की अभिरक्षा पिता को ही दी जाएगी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि अभिरक्षा का अंतिम आधार बच्चे का कल्याण है। यदि परिस्थितियां यह दिखाती हैं कि बच्चों का हित मां के साथ रहने में है, तो केवल पिता के प्राकृतिक संरक्षक होने के आधार पर उसे कस्टडी नहीं दी जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला
अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट सहित विभिन्न न्यायालयों के फैसलों का उल्लेख किया। Gayatri Bajaj बनाम Jiten Bajaj के फैसले का हवाला देते हुए कहा गया कि नाबालिग की कस्टडी तय करते समय उसके हित और कल्याण को सर्वोच्च महत्व दिया जाना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी माना कि बच्चे की देखभाल करने वाले माता-पिता की क्षमता, आर्थिक साधन और बच्चे के लिए उपलब्ध वातावरण जैसे पहलुओं पर विचार करना जरूरी है।
इसी तरह Baijabai बनाम Pathan Khan के फैसले का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि लंबे समय से अलग रह रहे माता-पिता की स्थिति में यदि मां बच्चों का उचित पालन-पोषण कर रही है तो परिस्थितियों के अनुसार मां को अभिरक्षा दी जा सकती है।
भाई-बहन को अलग करना भी उचित नहीं
अदालत ने दोनों बच्चों को अलग-अलग करने की संभावना पर भी विचार किया। कोर्ट ने कहा कि दोनों बच्चे भाई-बहन हैं और उनके बीच संबंध को देखते हुए उन्हें केवल माता-पिता के अधिकार के लिए एक-दूसरे से अलग करना उचित नहीं होगा।
इस संबंध में अदालत ने शालीन काबरा बनाम शिवानी काबरा मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए सिद्धांत का उल्लेख किया। इसमें बच्चों के बीच गहरे लगाव को देखते हुए उन्हें अलग करना उनके कल्याण के विपरीत माना गया है।
पिता के बयानों में भी विरोधाभास माना
अदालत ने दोनों पक्षों की ओर से अलग-अलग मामलों में पेश किए गए दस्तावेजों और बयानों की भी तुलना की। कोर्ट ने पाया कि दोनों पक्षों ने अलग-अलग कार्यवाहियों में कुछ अलग बातें कही हैं।
पिता द्वारा बेटे को अपनी बहन को गोद देने से जुड़े आरोपों का उल्लेख एक कार्यवाही में नहीं किए जाने और बाद की कार्यवाही में इस आरोप को उठाए जाने को अदालत ने भी महत्वपूर्ण माना।
कोर्ट ने कहा कि इन परिस्थितियों से यह संभावना बनती है कि यह आरोप बाद में लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से जोड़ा गया हो। अदालत ने समग्र साक्ष्यों के आधार पर मां के कथनों को पिता की तुलना में अधिक विश्वसनीय माना।
कोर्ट ने बच्चों की इच्छा पूछना जरूरी नहीं माना
अदालत ने यह भी नोट किया कि दोनों बच्चों को न्यायालय के सामने पेश नहीं किया गया और न ही उनसे उनकी इच्छा पूछी गई। हालांकि कोर्ट ने संबंधित न्यायिक दृष्टांत का हवाला देते हुए कहा कि हर मामले में बच्चे का साक्षात्कार लेना अनिवार्य नहीं है।
अदालत के अनुसार कस्टडी का फैसला केवल बच्चे की तत्काल इच्छा के आधार पर नहीं, बल्कि उसके समग्र हित और कल्याण को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
मां के पास ही रहेगी बच्चों की अभिरक्षा
सभी साक्ष्यों और परिस्थितियों का विश्लेषण करने के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि बेटी समृद्धि और बेटे सुलेख का सर्वोत्तम हित और कल्याण पिता की अभिरक्षा में नहीं, बल्कि मां की अभिरक्षा में है।
इसके आधार पर धारा 25, संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 के तहत पिता द्वारा दायर आवेदन को प्रमाणित नहीं पाए जाने पर निरस्त कर दिया गया।
हर रविवार पिता बच्चों से कर सकेंगे मुलाकात
हालांकि अदालत ने पिता को बच्चों से मिलने का अधिकार दिया है। आदेश के मुताबिक पिता प्रत्येक रविवार सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे के बीच दोनों बच्चों से मिल सकेंगे। इस दौरान प्रतिवादिनी यानी मां को किसी भी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न नहीं करने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने दोनों पक्षों को अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करने का आदेश दिया।
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