Rajasthan News: राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा है कि सरकारी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करते समय कारणों का स्पष्ट उल्लेख करना जरूरी है। अनुशासनात्मक अधिकारी को यह बताना होता है कि आरोप किस आधार पर सिद्ध माने गए हैं। इसके साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता पुलिसकर्मी के खिलाफ वेतन वृद्धि रोकने के आदेश को गलत मानते हुए निरस्त कर दिया है।

जस्टिस गणेश राम मीणा की एकलपीठ ने यह आदेश दिनेश कुमार अग्रवाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। अदालत ने कहा कि अपीलीय प्राधिकारी की भूमिका स्वतंत्र और प्रभावी होती है न कि केवल विभागीय आदेश की औपचारिक रूप से पुष्टि करना।
याचिका में अधिवक्ता हर्षवर्धन नंदवाना ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता साल 2005 में आबकारी विभाग में प्रतिनियुक्ति पर नियुक्त होकर बीकानेर में तैनात था। इस दौरान अवैध शराब से कुछ लोगों की मौत के मामले में विभाग ने याचिकाकर्ता की लापरवाही बताते हुए उसे जनवरी, 2008 में चार्जशीट दी। जिसका याचिकाकर्ता ने जवाब पेश कर दिया। इसके बावजूद डीजीपी ने जुलाई, 2008 में याचिकाकर्ता की दो वार्षिक वेतन वृद्धि रोकने का दंड दिया। इस दंडादेश में कहा गया कि याचिकाकर्ता का स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं था, लेकिन यह नहीं बताया गया कि स्पष्टीकरण किस आधार पर स्वीकार नहीं किया गया।
वहीं इस आदेशों के खिलाफ पेश विभागीय अपील को अपीलीय प्राधिकारी ने जनवरी 2013 में खारिज कर दिया। वहीं साल 2016 रिव्यू याचिका को भी खारिज कर दिया गया। इन सभी आदशों को हाईकोर्ट में याचिका दायर की चुनौती दी गई। याचिका में कहा गया कि मामले में याचिकाकर्ता की ओर से पेश स्पष्टीकरण पर विचार नहीं किया गया। वही अपीलीय अधिकारी ने भी विभागीय रिपोर्ट के आधार पर ही फैसला ले लिया। ऐसे में विभागीय आदेश और अपीलीय अधिकारी के आदेश सहित रिव्यू याचिका में दिए आदेश को निरस्त किया जाए। जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने तीनों आदेशों को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को राहत दी है।
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