Rajasthan Nikay Chunav 2026 में पार्षदों के नतीजे आने के बाद अब मेयर और पालिकाध्यक्ष चुनने की सियासत शुरू हो गई है। इसी के साथ बोर्ड बनाने के लिए जोड़तोड़ का दौर भी तेज हो गया है। कई निकायों में बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीटों का अंतर बेहद करीबी है, लेकिन चुनाव बाद के सियासी मैनेजमेंट में तस्वीर अलग नजर आ रही है। कांग्रेस कहीं बहुमत में होने के बावजूद बगावत से जूझ रही है तो कहीं सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद भी बोर्ड बनाने के लिए निर्दलीयों के भरोसे है। दूसरी तरफ बीजेपी कम संख्या के बावजूद कुछ निकायों में पार्षदों को अपने साथ जोड़कर या निर्विरोध निर्वाचन की स्थिति बनाकर आगे बढ़ती दिखाई दे रही है।

बीकानेर में बहुमत फिर भी कांग्रेस के सामने बगावत

बीकानेर कांग्रेस के लिए सबसे अहम उदाहरण है। 80 वार्ड वाले नगर निगम में कांग्रेस ने 42 सीटें जीती हैं। बहुमत का आंकड़ा 41 है। यानी पार्टी के पास बहुमत से एक सीट ज्यादा है। बीजेपी को 27, निर्दलीयों को 10 और आरएलपी को एक सीट मिली है। कांग्रेस ने पूर्व मंत्री बीडी कल्ला के भतीजे और वार्ड-73 के पार्षद अनिल कल्ला को मेयर पद का उम्मीदवार बनाया। लेकिन पार्टी के फैसले के बाद अंदरूनी विरोध सामने आ गया।

वार्ड-50 से कांग्रेस पार्षद नवरतन डागा ने पार्टी उम्मीदवार के खिलाफ निर्दलीय नामांकन दाखिल कर दिया। उन्होंने कल्ला परिवार को बार-बार टिकट दिए जाने पर सवाल उठाया है। कांग्रेस के लिए यह बगावत इसलिए अहम है क्योंकि बहुमत का आंकड़ा भले ही उसके पास है, लेकिन मेयर चुनाव में हर पार्षद की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। बीजेपी ने भी वार्ड-13 के पार्षद सुरेंद्र सिंह को उम्मीदवार बनाया है। ऐसे में कांग्रेस की अंदरूनी नाराजगी बीजेपी के लिए मौके में बदल सकती है।

खेतड़ी में कांग्रेस का पार्षद BJP के साथ

झुंझुनूं की खेतड़ी नगरपालिका में कांग्रेस को इससे भी बड़ा झटका लगा। 25 वार्ड वाली नगरपालिका में बीजेपी के 8, कांग्रेस के 4 और निर्दलीयों के 13 पार्षद जीते। कांग्रेस की पार्षद गीता सैनी बीजेपी में शामिल हो गईं। इसके बाद उन्होंने पालिकाध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल किया। उनके सामने किसी दूसरे उम्मीदवार ने नामांकन नहीं भरा। नतीजा यह रहा कि बहुमत नहीं होने के बावजूद बीजेपी के लिए अध्यक्ष पद का रास्ता साफ हो गया। कांग्रेस के एक पार्षद के पाला बदलने से पूरा समीकरण बदल गया।

कई जगह बीजेपी ने बिना मुकाबले बनाई बढ़त

महवा नगरपालिका: 35 वार्डों में बीजेपी के 17, कांग्रेस के 4 और निर्दलीयों के 14 पार्षद हैं। बीजेपी के विनीत बंसल के सामने कोई दूसरा नामांकन नहीं आया।

बसेड़ी नगरपालिका: 25 वार्डों में बीजेपी और कांग्रेस के 8-8 तथा निर्दलीयों के 9 पार्षद हैं। इसके बावजूद बीजेपी के राघवेंद्र जाटव के खिलाफ कोई दूसरा नामांकन नहीं आया और उनका निर्विरोध निर्वाचन तय हो गया।

गोविंदगढ़-रामबास नगरपालिका: 25 वार्डों में बीजेपी के 12, कांग्रेस के 2 और निर्दलीयों के 11 पार्षद हैं। कांग्रेस का सिंबल पहुंचने के बावजूद प्रत्याशी और प्रस्तावक समय पर नहीं पहुंच सके। इसके चलते बीजेपी की मधु गुप्ता का निर्विरोध निर्वाचन तय हो गया।

धोरीमन्ना नगरपालिका: बालोतरा की इस नगरपालिका के 20 वार्डों में बीजेपी ने 14, कांग्रेस ने 3 और निर्दलीयों ने 3 सीटें जीती हैं। बीजेपी की कीर्ति गोसाईवाल के सामने भी कोई दूसरा नामांकन नहीं आया।

कांग्रेस के सामने अब सिर्फ बहुमत का सवाल नहीं

इन घटनाओं ने चुनाव के बाद कांग्रेस के संगठन और पार्षद मैनेजमेंट पर सवाल खड़े किए हैं। बीकानेर में बहुमत होने के बावजूद पार्टी के भीतर से बगावत सामने आई। खेतड़ी में कांग्रेस का ही पार्षद बीजेपी के साथ चला गया। दूसरी तरफ जिन निकायों में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, वहां निर्दलीय पार्षदों की भूमिका बढ़ गई है। ऐसे में सिर्फ चुनाव जीतना पर्याप्त नहीं रह गया है। बोर्ड बनाने के लिए पार्षदों को साथ रखना और जरूरी संख्या जुटाना भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है।

मेयर और पालिकाध्यक्ष का चुनाव बना असली परीक्षा

पार्षदों के चुनाव का पहला दौर खत्म हो चुका है। अब असली सियासी परीक्षा बोर्ड गठन की है। बीकानेर जैसे निकाय में कांग्रेस के सामने अपने बहुमत को बनाए रखने की चुनौती है। खेतड़ी में बीजेपी ने कांग्रेस के पार्षद को अपने साथ लेकर स्थिति बदल दी। वहीं महवा, बसेड़ी, गोविंदगढ़-रामबास और धोरीमन्ना में नामांकन के समीकरण ने बीजेपी को बढ़त वाली स्थिति में ला दिया।

यानी राजस्थान निकाय चुनाव 2026 का नतीजा सिर्फ इस बात से तय नहीं होगा कि किस पार्टी ने कितने पार्षद जिताए। अब यह भी महत्वपूर्ण है कि कौन अपने पार्षदों को एकजुट रख पाता है और कौन बोर्ड बनाने के लिए जरूरी सियासी समीकरण तैयार करता है।

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