नई दिल्ली। कुख्यात ठग सुकेश चंद्रशेखर (Sukesh Chandrashekhar) को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट से करीब 6 साल पुराने भ्रष्टाचार के एक मामले में बड़ी राहत मिली है। अदालत ने इस मामले में उसे रिहा करने का आदेश दिया है। विशेष न्यायाधीश (पीसी एक्ट) विद्या प्रकाश ने 28 अक्टूबर को पारित अपने आदेश में कहा कि चंद्रशेखर आरोपों में अधिकतम संभावित सजा से ज्यादा समय पहले ही जेल में बिता चुका है। अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि अभियोजन पक्ष सुकेश चंद्रशेखर की रिहाई का विरोध कर रहा था, लेकिन वह यह साबित नहीं कर सका कि मुकदमे की कार्यवाही में हुई देरी के लिए आरोपी जिम्मेदार था। ऐसे में उसे अधिक समय तक हिरासत में रखने का आधार नहीं बनता।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सुकेश चंद्रशेखर आरोपों में अधिकतम संभावित सजा से ज्यादा समय पहले ही जेल में बिता चुका है। वहीं, उसकी रिहाई का विरोध कर रहा अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि मुकदमे की कार्यवाही में देरी के लिए आरोपी जिम्मेदार था।
2017 में दर्ज हुई थी FIR, 24 अक्टूबर को हुई गिरफ्तारी
सुकेश चंद्रशेखर के खिलाफ इस मामले में दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने वर्ष 2017 में FIR दर्ज की थी। 24 अक्टूबर 2017 को उसे गिरफ्तार किया गया था। उसके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की धारा 12 और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120B के तहत आरोप लगाए गए हैं। इन धाराओं के तहत दोषसिद्धि होने पर अधिकतम सात साल की सजा का प्रावधान है। हालांकि, मामले में अभी आरोपों पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
अधिकतम सात साल की सजा, जेल में बिता चुका है 8 साल 9 महीने
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, फैसले वाले दिन तक पैरोल और अंतरिम जमानत की अवधि को हटाने के बाद सुकेश चंद्रशेखर कुल 8 साल, 9 महीने और 14 दिन हिरासत में रह चुका था। यानी वह इस मामले में आरोपों के तहत अधिकतम संभावित सात साल की सजा की अवधि से भी अधिक समय जेल में बिता चुका था। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए अदालत ने उसे राहत देने का फैसला किया। अदालत ने यह भी माना कि अभियोजन पक्ष मुकदमे में देरी के लिए आरोपी की जिम्मेदारी साबित नहीं कर पाया।
कोर्ट ने आदेश में क्या कहा?
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा, ‘इसलिए, यह निर्देश दिया जाता है कि आवेदक/आरोपी सुकेश उर्फ सुकाश चंद्रशेखर को इस मामले में मुकदमे की कार्यवाही के दौरान हिरासत में न रखा जाए। अगर उसे किसी अन्य मामले में जरूरत नहीं है, तो उसे तुरंत जेल से रिहा कर दिया जाए।’
29 आपराधिक मामलों का हवाला देकर अभियोजन ने किया विरोध
हालांकि, अभियोजन पक्ष ने सुकेश की रिहाई का विरोध किया था। अभियोजन ने अदालत को बताया कि सुकेश के खिलाफ अलग-अलग राज्यों में 29 आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें कुछ मामले महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (MCOCA) के तहत भी दर्ज हैं। अभियोजन पक्ष ने आशंका जताई कि रिहाई मिलने पर सुकेश गवाहों को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा दलील दी गई कि 21 सितंबर 2022 को CrPC की धारा 436A के तहत जमानत मिलने के बावजूद उसने जमानतदार पेश नहीं किए थे। इसलिए उसे अपनी ही गलती का फायदा नहीं दिया जाना चाहिए।
अधिकतम सजा से ज्यादा समय हिरासत में रखना कानून के खिलाफ
सुनवाई के दौरान अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 436A के दूसरे प्रावधान का उल्लेख किया। इसके तहत किसी व्यक्ति को जांच, पूछताछ या मुकदमे के दौरान संबंधित अपराध के लिए कानून में निर्धारित अधिकतम सजा की अवधि से अधिक समय तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने यह भी पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि मुकदमे की कार्यवाही में देरी के लिए सुकेश जिम्मेदार था। ऐसे में अधिकतम संभावित सजा से ज्यादा समय हिरासत में रखने का आधार नहीं बनता।
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