राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने आगामी सांगठनिक चुनावों और रणनीतिक बदलावों के तहत संगठन में एक महत्वपूर्ण फेरबदल का ऐलान किया है। पार्टी के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष तेजस्वी यादव द्वारा शुरू की गई जिलावार बैठकों में यह तय किया गया है कि अब जिला अध्यक्ष पद की कमान पूरी तरह युवाओं के हाथों में सौंपी जाएगी। इस नई व्यवस्था के तहत वही व्यक्ति जिला अध्यक्ष बन सकेगा जिसकी उम्र 55 वर्ष से कम हो और जो भविष्य में कोई भी चुनाव नहीं लड़ेगा।
पार्टी का यह कदम चुनावी टिकटों की दावेदारी के टकराव को समाप्त करने और एक समर्पित फुलटाइम कैडर तैयार करने की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। पटना जिला (ग्रामीण) और पश्चिम चंपारण जिले के नेताओं के साथ शुरू हुई यह राज्यस्तरीय समीक्षा बैठक 27 सितंबर तक चलेगी। वर्तमान में राजद की सभी जिला कमेटियां भंग हैं और पार्टी के पास कुल 55 सांगठनिक जिले हैं। तेजस्वी यादव ने बैठक में शामिल 200 से अधिक नेताओं और कार्यकर्ताओं से जिला अध्यक्ष पद के लिए चार-चार नाम सुझाने का आग्रह किया है, ताकि सांगठनिक ढांचे को जमीनी स्तर पर मजबूत किया जा सके।
‘माय’ समीकरण और अन्य जातियों को जोड़ने की कवायद
बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के दौरान पार्टी के पारंपरिक ‘माय’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण में आई सुस्ती और वोटों में सेंध लगने के बाद राजद ने संगठन की पूरी ओवरहॉलिंग शुरू कर दी है। इस समीक्षा बैठक का मुख्य उद्देश्य ‘माय’ समीकरण को और अधिक अटूट बनाए रखना तथा अन्य पिछड़ी जातियों, वर्गों और जातियों को पार्टी के साथ जोड़ना है। पार्टी संगठन को अधिक सक्रिय बनाने के लिए नए सिरे से जिला अध्यक्षों और प्रधान महासचिवों की नियुक्ति पर मंथन किया जा रहा है ताकि बूथ स्तर तक पार्टी की पकड़ मजबूत हो सके।
जिला अध्यक्ष पद पर आरक्षण हटाने की मांग
पटना जिले की बैठक के दौरान विधायक और लोक लेखा समिति के अध्यक्ष भाई वीरेंद्र ने एक बड़ा प्रस्ताव रखते हुए मांग उठाई कि जिला अध्यक्ष के चयन में किसी भी प्रकार की आरक्षण व्यवस्था नहीं होनी चाहिए। उनका तर्क था कि पार्टी को मजबूती से वोट दिलाने वाले और जमीनी स्तर पर काम करने वाले नेता को ही इस पद की जिम्मेदारी मिलनी चाहिए। बैठक में मौजूद अधिकांश नेताओं ने इस प्रस्ताव पर सहमति जताई। मौजूदा समय में राजद संगठन में जिला अध्यक्ष पद के लिए ईबीसी (अति पिछड़ा वर्ग) और दलित वर्ग के आरक्षण का प्रावधान है, जिसके चलते कई जिलों में मजबूत नेतृत्व के अभाव में संगठन पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पा रहा है।
आरक्षण समीक्षा पर पार्टी के भीतर अंतर्विरोध
संगठन में बदलाव के इन फैसलों के बीच आरक्षण की समीक्षा के मुद्दे पर राजद के शीर्ष नेतृत्व में विरोधाभास भी खुलकर सामने आ गया है। राजद के प्रदेश अध्यक्ष मंगनी लाल मंडल ने इस मामले पर हम (से.) प्रमुख जीतन राम मांझी का समर्थन करते हुए कहा है कि आरक्षण की समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए, हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आरक्षण को कोई समाप्त नहीं कर सकता। इसके विपरीत, तेजस्वी यादव आरक्षण की किसी भी प्रकार की समीक्षा का खुलेआम विरोध करते आए हैं। तेजस्वी ने इसके लिए 2015 के विधानसभा चुनावों के दौरान आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान और उसके बाद आए चुनावी परिणामों का उदाहरण भी दिया था। लोजपा (आर) प्रमुख चिराग पासवान भी आरक्षण समीक्षा के विरोध में खड़े नजर आते हैं।
राजद के सामने एक तरफ संगठन को नए सिरे से खड़ा करने की बड़ी चुनौती है, तो दूसरी तरफ पार्टी के भीतर नेताओं के अलग-अलग बयानों से उपजी आंतरिक खींचतान से पार पाना भी एक बड़ी परीक्षा साबित होगा।



