अविनाश श्रीवास्तव, रोहतास। समाज में फैली रूढ़िवादी और पारंपरिक सोच को दरकिनार करते हुए रोहतास जिले के डेहरी के न्यू डिलिया स्थित वार्ड नंबर-20 में एक पिता के निधन के बाद उनकी चारों बेटियों ने समाज की पुरानी मान्यताओं को तोड़ते हुए न सिर्फ अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया, बल्कि मुखاग्नि देकर अंतिम संस्कार की सभी रस्मों को भी पूरा किया।

​क्या है पूरा मामला?

​न्यू डिलिया निवासी स्वर्गीय अरुण कुमार पिछले कुछ समय से गंभीर बीमारी यानी कैंसर से पीड़ित थे। लंबी और दर्दनाक जंग के बाद आखिरकार वे जिंदगी की जंग हार गए और उनका निधन हो गया। लगभग 50 वर्षीय अरुण कुमार अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं, जिसमें उनकी चार पुत्रियां शामिल हैं।
​खास बात यह है कि अरुण कुमार की पत्नी नीरू देवी का पहले ही निधन हो चुका था। वहीं, उनकी चार बेटियों में से दो की शादी हो चुकी है, जबकि दो पुत्रियां अभी अविवाहित हैं। घर में कोई बेटा न होने के कारण जब अरुण कुमार का निधन हुआ, तो अंतिम संस्कार को लेकर समाज की पुरानी दबी-कुचली परंपराओं के बीच उनकी बेटियों ने खुद आगे आने का ऐतिहासिक फैसला किया।

​बेटियों ने निभाई बेटे की फर्ज और जिम्मेदारी

​हमारे समाज में आज भी बेटा न होने पर वंश या अंतिम संस्कार को लेकर तमाम तरह की बातें कही जाती हैं। लेकिन इन चारों बेटियों ने साबित कर दिया कि माता-पिता का सच्चा सहारा और वारिस उनकी संतान होती है, चाहे वह बेटा हो या बेटी।
​मृतक अरुण कुमार की बेटी शिवानी ने नम आंखों से बताया कि उनके पिता ने चारों बेटियों के लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा और परवरिश में कभी कोई कमी नहीं छोड़ी। उन्हें कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि उनका कोई बेटा नहीं है। एक बेटे की तरह ही उनका पालन-पोषण किया गया था। बेटियों ने मिलकर अपने बीमार पिता की अंतिम समय तक सेवा की, लेकिन आखिरकार नियति को कुछ और ही मंजूर था।

​श्मशान घाट तक खुद पहुंचाया पार्थिव शरीर

​पिता के निधन के बाद चारों बेटियों ने हिम्मत जुटाई और खुद अर्थी को कंधा देकर श्मशान घाट तक पहुंचाया। श्मशान भूमि पर पहुंचकर बेटियों ने अपने हाथों से पिता को मुखाग्नि दी। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद हर एक शख्स की आंखें नम हो गईं और लोग बेटियों के इस साहस की सराहना करने लगे। शिवानी का कहना है कि उन्होंने अपने पिता को कंधा देकर और मुखाग्नि देकर अपना फर्ज निभाया है, क्योंकि उनके पिता ने उन्हें हमेशा आत्मसंबल और बराबरी का अधिकार दिया था।