Bihar News: बिहार में आरक्षण को लेकर NDA के अंदर ही मतभेद अब खुलकर सामने आने लगे हैं। ‘कोटे में कोटा’ और क्रीमी लेयर के मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान तथा हम (सेक्युलर) के संरक्षक जीतन राम मांझी और राष्ट्रीय अध्यक्ष संतोष कुमार सुमन आमने-सामने हैं। दोनों नेताओं के बयानों से आरक्षण के सवाल पर गठबंधन के भीतर बढ़ती खींचतान साफ नजर आ रही है। अब मामला केवल आरक्षण और उसकी समीक्षा तक सीमित नहीं रह गया है। बल्कि सवर्ण समाज, आरक्षण से वंचित गरीब और समाजिक न्याय की राजनीति से भी जुड़ गया है।

एक तरफ आरक्षण की समीक्षा तक मंजूर नहीं कहने वाले चिराग पासवान अब यह कह रहे है कि NDA सरकार सवर्ण जातियों की आशंकाओं को दूर करने के लिए प्रतिबद्ध है। वंचित वर्गों के हितों की रक्षा करते हुए यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी दूसरे सामाजिक समूह के साथ अन्याय या शोषण न हो। इसके लिए उन्होंने स्वर्ण समाज के नेताओं से भी मांग उठाने की बात कही है।

वहीं, उनकी पार्टी से सांसद अरुण भारती ने एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए यह दावा किया है कि अगस्त 1990 में पिछड़े समाज के आरक्षण को लागू करवाने, अगस्त 2018 में दलित-आदिवासी सुरक्षा कानून की बहाली, सितंबर 2018 में सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए आरक्षण की मांग और जनवरी 2019 में सामान्य वर्ग के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण लागू कराने में रामविलास पासवान की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने अपनी पोस्ट में यह भी लिखा कि, ‘हमारी सीट आरक्षित है-हमारी सोच नहीं।’

चिराग पासवान और सांसद अरुण भारती के इस बयान पर अब संतोष कुमार सुमन की प्रतिक्रिया सामने आई है। उन्होंने सोशल मीडिया एक्स पर एक लंबा चौड़ा पोस्ट करते हुए लिखा, आज कुछ लोग सवर्ण समाज के हितों की बात कर रहे हैं, लेकिन इतिहास इस बात का गवाह है कि आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए आरक्षण की पहल करने वालों में जीतन राम मांझी सबसे आगे रहे हैं। फरवरी 2015 में बिहार के मुख्यमंत्री रहते हुए जीतन राम मांझी की कैबिनेट ने आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव पारित किया था। लेकिन कुछ ही दिनों बाद वे मुख्यमंत्री पद से हटा दिए गए और यह निर्णय लागू नहीं हो सका।

बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का ऐतिहासिक निर्णय लेकर उसे पूरे देश में लागू किया। इसके लिए हम प्रधानमंत्री के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर) और जीतन राम मांझी की राजनीति किसी एक जाति या वर्ग तक सीमित नहीं रही है। हमारी राजनीति का केंद्र हर वर्ग का गरीब और वंचित व्यक्ति रहा है।

उन्होंने कहा कि, हमारा स्पष्ट मानना है कि गरीब की तकलीफ जाति देखकर नहीं आती। गरीबी अगड़े-पिछड़े, दलित-सवर्ण, हिंदू-मुस्लिम का भेद नहीं करती। इसलिए गरीबों के अधिकार और अवसर की लड़ाई भी किसी एक जाति तक सीमित नहीं होनी चाहिए। हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा ने शुरू से ही संकीर्ण सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों से ऊपर उठकर गरीबों को केंद्र में रखने की राजनीति की है। हमारा नारा है-“सबका इरादा नेक हो, भारत के गरीबों एक हो।”

लेकिन आज जब हम दलित समाज के भीतर “कोटे में कोटा” और आरक्षण के लाभ की समीक्षा पर चर्चा की बात करते हैं, तो कुछ लोग इसका विरोध करते हुए कहते हैं कि समीक्षा तो दूर, इस विषय पर चर्चा तक नहीं होने देंगे। हमारा सवाल केवल इतना है कि आखिर आरक्षण का लाभ समाज के सबसे गरीब, सबसे वंचित और अंतिम पायदान पर खड़े परिवारों तक व्यापक रूप से पहुंच रहा है या नहीं? क्या इस पर शांतिपूर्वक और सकारात्मक चर्चा भी नहीं हो सकती?

संतोष सुमन ने कहा कि, हम “कोटे में कोटा” की बात किसी का अधिकार छीनने के लिए नहीं कर रहे हैं। हमारा उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण और अवसरों का लाभ कुछ सक्षम परिवारों तक सीमित न रह जाए, बल्कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े गरीब, लाचार और वंचित परिवारों तक भी व्यापक रूप से पहुंचे।

लेकिन जब उनकी इस सोच और भाषा के खिलाफ सवर्ण समाज के एक वर्ग ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाने शुरू किए, तब अचानक उन्हें सवर्णों की चिंता और अपने राजनीतिक नारे तथा समीकरण की फिक्र होने लगी। इसके बाद वे सवर्णों के हितों की बात करने और उनकी पैरवी करने लगे। गरीब सवर्णों की बात करना निश्चित रूप से अच्छी बात है, लेकिन सवाल यह है कि गरीबों की चिंता किसी राजनीतिक दबाव के बाद क्यों शुरू होती है?

उन्होंने कहा कि, भारत और बिहार की राजनीति में लंबे समय से अलग-अलग सामाजिक समीकरणों के आधार पर राजनीति होती रही है। किसी ने MY समीकरण बनाया, किसी ने PDA की राजनीति की, तो किसी ने पंडित-पासी-पासवान का नारा दिया। लेकिन हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर) ने शुरू से ही इन संकीर्ण राजनीतिक समीकरणों से अलग एक व्यापक विचार को अपनाया। हमारी राजनीति किसी विशेष जाति की नहीं, बल्कि हर जाति और हर वर्ग के गरीब की चिंता की राजनीति है।

संतोष सुमन ने कहा कि, हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” के सिद्धांत को मानने वाले लोग हैं। हम दिखावे की राजनीति, समीकरण गढ़ने की राजनीति और समय तथा राजनीतिक दबाव के हिसाब से अपने नारे बदलने वालों में नहीं हैं। हम नेक इरादे, स्पष्ट सिद्धांत और एक समान सोच के साथ राजनीति करने वाले लोग हैं।

हमारी पार्टी की सोच हमेशा से समावेशी रही है। हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर) ने अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में बिहार के पहले मुख्यमंत्री और आधुनिक बिहार को गढ़ने वाले डॉ. श्रीकृष्ण सिंह, गरीबों के मसीहा जननायक कर्पूरी ठाकुर और संघर्ष एवं संकल्प की मिसाल बाबा दशरथ मांझी को भारत रत्न देने का प्रस्ताव पारित किया था। आज कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न मिल चुका है, जिसके लिए हम प्रधानमंत्री का धन्यवाद करते हैं। लेकिन डॉ. श्रीकृष्ण सिंह और बाबा दशरथ मांझी को भारत रत्न देने की हमारी मांग आज भी पूरी मजबूती से जारी है।

उन्होंने कहा कि, हम समाज को बांटने नहीं, सबको साथ लेकर चलने की राजनीति करते हैं। हम दबाव देखकर अपने नारे नहीं बदलते और न ही राजनीतिक समीकरण देखकर गरीबों की चिंता शुरू करते हैं। जीतन राम मांझी ने मुख्यमंत्री रहते हुए आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की पहल करके यह स्पष्ट कर दिया था कि उनके लिए गरीब की पहचान उसकी जाति नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति है। हमारा इरादा नेक है और हमारा रास्ता स्पष्ट है- “सबका इरादा नेक हो, भारत के गरीबों एक हो।”

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