Sawan Special : सावन का महीना भगवान शिव को सबसे प्रिय माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि सावन में शिवजी की पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। समुद्र मंथन के दौरान निकले विष को भगवान शिव ने सावन में ही ग्रहण किया था, इसलिए यह महीना उनकी आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। यह महीना भक्ति और आस्था का प्रतीक है। सावन में लोग अक्सर भगवान शिव के किसी न किसी मंदिर में दर्शन करने के लिए जरूर जाते हैं। देश में भगवान शिव के कई ऐसे मंदिर हैं जो काफी प्रसिद्ध हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि राजधानी जयपुर से 85 किलोमीटर दूर भगवान शिव का बेहद प्राचीन मंदिर है। पांडेश्वर महादेव मंदिर में दुनिया का एकमात्र 12 मुख वाला 6 टन वजनी शिवलिंग है।

बता दें कि राजस्थान की राजधानी जयपुर से 85 किलोमीटर दूर विराटनगर के पंचखंड पर्वत की चोटी पर तीन चट्टानें से बने पांडेश्वर महादेव मंदिर का संबंध महाभारत काल से है। बताया जाता है कि महाभारत के समय विराटनगर में 700 फीट की ऊंचाई पर स्थित गुफा में पांचों पांडवों ने इस शिवलिंग को स्थापित किया था. इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग की ऊंचाई सवा सात फीट है.
यहां पांडव छुपाते थे अपने शस्त्र
पंचखंड पर्वत की चोटी पर तीन चट्टानें के तीन गेट हैं. महाभारत में उल्लेख मिलता है कि पांडवों के 12 साल के वनवास के दौरान उन्होंने कुछ समय इन गुफाओं में बिताया था. उन्होंने इस दौरान शिवलिंग को स्थापित किया था. मंदिर के 13 वें आचार्य स्वामी सोमेंद्र महाराज ने बताया कि अज्ञातवास के दौरान जब पांडव यहां पर आए थे, तब वे यहीं पर अपने शस्त्र छुपाते थे. इसके अलावा सम्राट अशोक ने भी इस पहाड़ी पर 300 दिन बिताए थे.
अघोरी ने बंद कर दी थी गुफा
स्वामी सोमेंद्र महाराज ने बताया कि एक समय पर इस मंदिर में एक अघोरी भगवान शिव की पूजा किया करते थे. लेकिन, जब वे यहां से गए तो उन्होंने गुफा को पत्थरों से बंद कर दिया. उस समय यहां पर छोटे आकर का शिवलिंग स्थापित था. उन्होंने बताया कि सालों तक इस दौरान मंदिर बंद रहा. तक हमारे पूर्वजों ने इस मंदिर से पत्थर हटाए और भगवान शिव की वापस पूजा अर्चना करना शुरू की. इसके बाद समय बीतने के साथ धीरे-धीरे वह शिवलिंग खंडित होने लगा जिसके बाद 2004 में खंडित शिवलिंग को गंगा में प्रवाहित कर दिया और संपूर्ण विधि विधान के साथ 6 टन वजनी सवा सात फिर ऊंचा शिवलिंग स्थापित किया गया.
संत यहां आकर करते हैं तपस्या
स्वामी सोमेंद्र महाराज बताते हैं कि इस मंदिर में अभी भी संत और अघोरी आकर तपस्या करते हैं. समय-समय पर यहां कई धार्मिक आयोजन भी होते हैं. शिवरात्रि पर यहां विशेष आयोजन होते हैं. इस मंदिर को लेकर मान्यता है 12 मुख वाले शिवलिंग की पूजा करने से भक्तों की मनोकामना जरूर पूरी होती है.


