भोपाल। भोज भूमि पुनि जागे ज्ञाना। होइ विश्वगुरु भारत नाना॥ भारत के पुनः विश्वगुरु बनने और ज्ञान के पुनर्जागरण की भावना को व्यक्त करने वाली राष्ट्रवादी रचनाओं से उधृत इस पंक्ति का तात्पर्य है कि यह पूजनीय (भोज) भारत भूमि फिर से जागृत हो रही है और यहाँ का ज्ञान पुनः विश्व को दिशा दिखाएगा। अब सवाल यह है कि क्या भोजशाला भारत के ‘विश्वगुरु’ बनने की दिशा में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आधार बन रहा है? क्योंकि भारत के ‘विश्वगुरु’ बनने का सपना आर्थिक और तकनीकी विकास के साथ ही एक गहन सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और ज्ञान-आधारित पुनर्जागरण की परिकल्पना भी है। इस व्यापक दृष्टि में मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला का विशेष महत्व है। पूरी दुनिया को दिशा देने वाली भोजशाला एक ऐतिहासिक स्मारक होने के साथ ही साथ भारत के ज्ञान परंपरा का जीवंत प्रतीक भी है। 11वीं शताब्दी में परमार वंश के महान शासक राजा भोज द्वारा स्थापित भोजशाला दरअसल एक विशाल संस्कृत विद्यापीठ और वाग्देवी यानी माता सरस्वती का मंदिर था। पूजा-अर्चना का केंद्र होने के साथ ही साथ यह स्थान दर्शन, व्याकरण, खगोल विज्ञान और साहित्य के गहन अध्ययन का प्रमुख केंद्र था। जिस युग में नालंदा विश्वविद्यालय और तक्षशिला विश्वविद्यालय विश्वभर में शिक्षा के शिखर माने जाते थे उसी दौर में भोजशाला भी विद्वानों और छात्रों को आकर्षित करती थी। इस तथ्य से यह बात स्वयं सिद्ध भी होती है कि भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था कितनी व्यापक और उन्नत थी।
मध्यप्रदेश सरकार की पहल और भविष्य की दिशा
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा भोजशाला में “भोज शोध संस्थान” और “सरस्वती लोक” स्थापित करने की घोषणा इस दिशा में एक शानदार कदम है। इससे न केवल सांस्कृतिक पुनर्जागरण को गति मिलेगी बल्कि शिक्षा और अनुसंधान के नए आयाम भी खुलेंगे। देश के प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन में मध्यप्रदेश की सरकार, भारत के ‘विश्वगुरु’ बनने के संकल्प को मूर्त रूप देने का प्रयास कर रही है। यदि उनकी यह परियोजना सफल होती है तो यह मध्य प्रदेश के साथ पूरे देश के लिए एक प्रेरणा बनेगी।

विश्वगुरु बनने के व्यापक आयाम है भोजशाला
आर्थिक शक्ति, तकनीकी प्रगति, रक्षा आत्मनिर्भरता और कूटनीतिक प्रभाव के साथ भारत के ‘विश्वगुरु’ बनने की अवधारणा बहुआयामी है। जैसा कि अनुमान है 2047 तक भारत 30-40 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन सकता है। लेकिन भारत के श्रेष्ठ होने के मूल में जो तत्व सबसे महत्वपूर्ण है वह है भारतीय ज्ञान और संस्कृति। इसके अलावा योग, आयुर्वेद, वेद और उपनिषद जैसे ज्ञान भारत की अमूल्य धरोहर हैं। शून्य और दशमलव जैसी प्रणाली देने वाले वैज्ञानिकों का योगदानों जिसने समूची दुनिया को एक नई दिशा देने का काम किया है इन सब को समग्रता से देखा जाय तो भोजशाला इन सभी आयामों को एक साथ जोड़ने वाली कड़ी भी बन सकती है।
देश के लिए बहुत आवश्यक है ज्ञान-आधारित पुनरुत्थान
आज जब भारत 2047 तक ‘विश्वगुरु’ बनने के लिए कृत संकल्पित है तब यह भी अनिवार्य हो जाता है कि हम अपने ऐतिहासिक ज्ञान केंद्रों को पुनर्जीवित करें। नई शिक्षा नीति (NEP) में अनुसंधान, नवाचार और भारतीय ज्ञान परंपरा को बढ़ावा देने की बात कही जा रही है। ऐसे में भोजशाला का पुनरुद्धार करके भविष्य की दिशा तय करते हुए अतीत की स्मृति को संजोया जा रहा है।

धार की पवित्र भूमि पर एक आधुनिक विश्वविद्यालय या “सरस्वती लोक” का स्थापित हो जाना भारत को एक बार फिर वैश्विक शिक्षा मानचित्र पर अग्रणी बना सकता है। क्योंकि यहाँ का प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का समन्वय निश्चित तौर पर विश्व के लिए एक आदर्श मॉडल प्रस्तुत करने वाला होगा। भोजशाला के पुनर्जागरण को भारत के पुनर्जागरण के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है।
सांस्कृतिक चेतना और आध्यात्मिक आधार है भोजशाला
आध्यात्मिक पहचान, भोजशाला का एक और महत्वपूर्ण आयाम है। भोजशाला ज्ञान, कला और बुद्धि की देवी मां सरस्वती की साधना स्थली मानी जाती हैं। अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा कोई राष्ट्र ही ‘विश्वगुरु’ बन सकता है और यही पहली शर्त भी है। भारत ने दुनिया को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ यानी पूरी दुनिया एक परिवार है का संदेश दिया है। भारत का यह दर्शन जीवन की एक संपूर्ण पद्धति है और मध्यप्रदेश की भोजशाला इसी दर्शन का एक गहनतम प्रतीक है जहाँ ज्ञान और आध्यात्म एक साथ विकसित हुए।

सांस्कृतिक स्वाभिमान का पुनर्जागरण है भोजशाला का उत्थान
भारत में सांस्कृतिक धरोहरों के पुनरुद्धार को लेकर वर्तमान समय में व्यापक जागरूकता देखी जा रही है। जिस तरह अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक बना ठीक वैसे ही धार के भोजशाला का पुनरुत्थान भी भारतीय अस्मिता को सशक्त करेगा। भोजशाला का पुनर्निर्माण उस गौरवशाली इतिहास की पुनर्स्थापना है जिसे समय, परिवेश और परिस्थितियों ने धूमिल कर दिया था। मगर सत्य तो यही है कि अपने अतीत को सम्मान देने वाला कोई राष्ट्र ही भविष्य में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकता है।

अतीत से भविष्य की ओर निहार रही है भोजशाला
ऐतिहासिक स्थल भोजशाला भारत के आत्मबोध का केंद्र है जो हमें यह याद दिलाती है कि हमारा अतीत कितना समृद्ध था और हमें यह भी चेताती है कि हमारा भविष्य कितना उज्ज्वल हो सकता है। यदि भारत को सच में ‘विश्वगुरु’ बनना है तो उसे आधुनिकता के साथ संतुलन बनाते हुए अपनी जड़ों से शक्ति लेनी होगी और भोजशाला इस संतुलन का ऐसा सर्वोत्तम उदाहरण बन सकती है जो आने वाले समय में भारत के वैश्विक नेतृत्व की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

संदीप अखिल
सलाहकार संपादक
न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम

