लखनऊ. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने दहेज उत्पीड़न और आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में एक अहम फैसला सुनाते हुए पति को दोषमुक्त कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि अगर आत्महत्या से काफी समय पहले पति-पत्नी के बीच कोई संपर्क या बातचीत नहीं थी, तो केवल वैवाहिक विवाद के आधार पर पति को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने अंकुर टंडन की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले और सजा को रद्द कर दिया. निचली अदालत ने आरोपी पति को आईपीसी की धारा 498-ए, 306 और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत दोषी ठहराया था.

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आत्महत्या से 5 महीने पहले से बंद थी बातचीत

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि मृतका की आत्महत्या से पांच महीने 12 दिन पहले से पति और पत्नी के बीच किसी भी तरह का संवाद नहीं था. अदालत ने कहा कि ऐसे हालात में पति पर आत्महत्या के लिए उकसाने का सीधा आरोप नहीं लगाया जा सकता. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में अभियोजन(Prosecution) पक्ष को यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी ने जानबूझकर ऐसा कोई कदम उठाया या दबाव बनाया, जिससे पीड़िता आत्महत्या करने के लिए मजबूर हुई.

फ्लैट खरीदने के लिए 10 लाख रुपये दहेज मांगने का आरोप

मामला साल 2004 में हुई शादी से जुड़ा है. मृतका की शादी 14 दिसंबर 2004 को हुई थी. आरोप लगाया गया था कि पति ने फ्लैट खरीदने के लिए 10 लाख रुपये दहेज की मांग की थी. मृतका के पिता ने आरोप लगाया था कि उन्होंने जमीन बेचकर छह लाख रुपये दिए, लेकिन बाकी चार लाख रुपये के लिए बेटी को प्रताड़ित किया गया. इसके बाद महिला ने 2 अक्टूबर 2010 को आत्महत्या कर ली थी.

गवाहों के बयानों में विरोधाभास को माना अहम

हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में अंतर पाया. अदालत ने कहा कि छह लाख रुपये दहेज देने के दावे को लेकर साक्ष्यों में स्पष्टता नहीं थी. जमीन बेचने की तारीख, बिक्री राशि और पैसे दिए जाने को लेकर भी पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले. कोर्ट ने कहा कि केवल वैवाहिक तनाव या आपसी विवाद को आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार नहीं माना जा सकता.

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ठोस प्रमाण के बिना नहीं बनता आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला

अदालत ने कहा कि धारा 306 के तहत दोष साबित करने के लिए आरोपी की ओर से उकसावे या सहायता का ठोस प्रमाण जरूरी है. केवल आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. इसी आधार पर हाईकोर्ट ने अंकुर टंडन को राहत देते हुए ट्रायल कोर्ट का फैसला निरस्त कर दिया और उन्हें मामले से बरी कर दिया.