कृष्ण कुमार सैनी, चंडीगढ़। हरियाणा की सियासत में कभी एक ही परिवार की ताकत माने जाने वाला चौटाला परिवार अब अलग-अलग राजनीतिक खेमों में बंट चुका है। इनेलो और जजपा की अलग राहों के बाद अब परिवार की चौथी पीढ़ी के नेताओं के बयानों में भी राजनीतिक शैली का अंतर खुलकर सामने आने लगा है। ताजा मामला कर्ण चौटाला और दिग्विजय चौटाला के बीच ‘तोप’ और ‘काम’ को लेकर शुरू हुई जुबानी जंग से जुड़ा है।

विवाद की शुरुआत इनेलो प्रमुख अभय सिंह चौटाला के बड़े बेटे कर्ण चौटाला के एक रैली में दिए बयान से हुई। रोहतक में डीसी और एसपी के साथ उनके विधायक भाई अर्जुन चौटाला की बहस के संदर्भ में कर्ण ने अर्जुन का बचाव करते हुए उन्हें ‘तोप’ बताया था। उन्होंने कहा था कि अर्जुन को समझाकर बैठाना पड़ता है और उन्हें समझाने वाला कर्ण चौटाला है। कर्ण ने यह भी कहा कि जिस दिन वह आराम करने बैठ गए और अर्जुन से अपना रौब दिखाने के लिए कह दिया, उस दिन सामने वालों को पता नहीं चलेगा कि ‘तोप के गोले’ कहां-कहां से आ रहे हैं।

कर्ण का यह बयान सामने आने के बाद जजपा के युवा प्रदेशाध्यक्ष दिग्विजय चौटाला ने उसी रूपक को पकड़कर पलटवार किया। चौटाला गांव में जजपा के कार्यक्रम के दौरान दिग्विजय ने बिना इनेलो का नाम लिए कहा कि राजनीति में ‘तोप और तलवार’ नहीं चलती, बल्कि जनता के बीच रहकर काम करने से राजनीतिक आधार तैयार होता है। इसी दौरान उन्होंने तंज कसते हुए कहा- “तोप और तलवार इनको दे दो, काम हमें दे दो।”

दिग्विजय ने अपने संबोधन में चौटाला परिवार की राजनीतिक परंपरा और जनता के बीच रहने की बात को भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि चौटाला के लोग बहादुर हैं और संघर्ष का इतिहास रखते हैं। उनके बयान का निशाना केवल कर्ण के शब्द नहीं थे, बल्कि राजनीतिक काम करने के तरीके पर भी था। इस तरह ‘तोप’ का रूपक अब दोनों खेमों के बीच अलग-अलग सियासी तेवरों को दिखाने वाला मुद्दा बन गया है।

डबवाली विधानसभा चुनाव में अपनी हार का जिक्र करते हुए दिग्विजय ने खुद को हारा हुआ मानने से इनकार किया। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने चुनाव जीतने वाले उम्मीदवार से ज्यादा काम किया है। इसी संदर्भ में उन्होंने सवाल किया कि “जीतने वाला नजर आता है क्या?” उनके इस बयान को अपनी राजनीतिक सक्रियता और जनसंपर्क को रेखांकित करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

दरअसल, चौटाला परिवार में राजनीतिक मतभेद नई बात नहीं हैं। अभय सिंह चौटाला और अजय सिंह चौटाला की राजनीतिक राहें अलग होने के बाद इनेलो और जजपा दो अलग संगठन बन गए। परिवार को दोबारा एक मंच पर लाने के प्रयास भी समय-समय पर हुए, लेकिन वे आगे नहीं बढ़ सके। ताऊ देवीलाल के छोटे बेटे रणजीत चौटाला भी परिवार को एकजुट करने की कोशिशों से हाथ खड़े कर चुके हैं।

अब इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में कर्ण और दिग्विजय के बयानों को देखा जा रहा है। दोनों चचेरे भाइयों के बीच ‘तोप’, ‘तलवार’ और ‘काम’ के रूपकों के जरिए सामने आई जुबानी जंग सिर्फ व्यक्तिगत तंज तक सीमित नहीं दिखती। इसके पीछे देवीलाल की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के तरीके और नई पीढ़ी की सियासी शैली को लेकर अलग-अलग संदेश भी दिखाई देते हैं।

एक तरफ कर्ण चौटाला के बयान में आक्रामकता और राजनीतिक प्रतिरोध का तेवर नजर आता है, तो दूसरी तरफ दिग्विजय चौटाला जनता के बीच काम करने को अपनी राजनीति का आधार बताते हैं। ऐसे में चौटाला परिवार की चौथी पीढ़ी की यह सियासी नोकझोंक आने वाले समय में विरासत और राजनीतिक पहचान की लड़ाई को किस दिशा में ले जाती है, इस पर नजर रहेगी।

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