सिंगरौली, सुरेश पाण्डेय। देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाली मध्यप्रदेश की ऊर्जाधानी सिंगरौली अब एक ऐसे बदलाव की दहलीज पर खड़ी है, जहां विकास और विस्थापन आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं। कोयला उत्पादन के विस्तार के लिए सैकड़ों साल पुराने मोरवा शहर को हटाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। एक तरफ देश की बिजली व्यवस्था और ऊर्जा आत्मनिर्भरता का सवाल है, तो दूसरी तरफ उन हजारों परिवारों का दर्द है, जिनकी तीन-तीन पीढ़ियों की यादें इस शहर से जुड़ी हैं।
22 हजार मकान…
50 हजार लोगों का विस्थापन…
30 से ज्यादा स्कूल…
दर्जनों मंदिर, मस्जिद और अस्पताल…
यानी सिर्फ घर नहीं, बल्कि एक पूरा शहर इतिहास बनने जा रहा है।
सिंगरौली को देश की कोयला राजधानी कहा जाता है। यहां से देश के कुल कोयला उत्पादन का करीब 15 प्रतिशत हिस्सा निकलता है। इसी कोयला उत्पादन को बढ़ाने के लिए एनसीएल की जयंत परियोजना का विस्तार किया जा रहा है। जयंत खदान देश की सबसे बड़ी कोयला खदानों में शामिल है, जहां हर साल करीब 30 मिलियन टन कोयले का उत्पादन होता है। एनसीएल प्रबंधन के मुताबिक खदान विस्तार होने से अगले करीब 25 वर्षों तक कोयला उत्पादन जारी रह सकेगा। यही कोयला NTPC Limited सहित कई बड़े बिजली संयंत्रों की जरूरत पूरी करता है।
लेकिन इस विकास की कीमत मोरवा शहर चुका रहा है। सैकड़ों साल पुराने इस शहर में रहने वाले लोग अब अपने आशियाने छोड़ने को मजबूर हैं। लल्लूराम डॉट की ग्राउंड रिपोर्ट में लोगों ने बताया कि उन्होंने अपना बचपन, जवानी और पूरी जिंदगी इसी शहर में गुजारी है।अब घर छोड़कर नई जगह बसने का दर्द उन्हें परेशान कर रहा है। कई लोगों का कहना है कि मुआवजा मिल रहा है, लेकिन सवाल सिर्फ पैसों का नहीं है… सवाल उन यादों का है जो इस शहर की गलियों से जुड़ी हुई हैं।
एनसीएल के मुताबिक मोरवा विस्थापन की प्रक्रिया फरवरी 2024 से शुरू की गई थी। सर्वे के बाद अब नोटिस, मुआवजा और मकान हटाने की कार्रवाई शुरू हो चुकी है। अब तक करीब 70 मकान पूरी तरह ध्वस्त किए जा चुके हैं, जबकि 475 मकानों की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। विस्थापन की पूरी प्रक्रिया वर्ष 2029-30 तक पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है।
एनसीएल ने विस्थापितों को तीन श्रेणियों में बांटा है।
पहली श्रेणी में जमीन के मालिक यानी टाइटल होल्डर हैं।
दूसरी श्रेणी में गैर टाइटल होल्डर यानी सरकारी या अन्य जमीन पर बसे लोग हैं।
तीसरी श्रेणी में आजीविका से जुड़े लोग हैं, जिनमें छोटे दुकानदार और रोजगार पर निर्भर परिवार शामिल हैं।
मुआवजा प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए एलएडीएम पोर्टल के माध्यम से डिजिटल व्यवस्था की गई है।
मोरवा शहर के सात वार्ड इस विस्थापन की जद में
वार्ड क्रमांक 10 और 9 से प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इसके बाद वार्ड क्रमांक 8, 7, 5, 4 और 3 को भी विस्थापित किया जाएगा।
इस पूरे क्षेत्र में करीब 50 हजार लोग प्रभावित होंगे। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या लोगों को सिर्फ मुआवजा मिलेगा या एक नया व्यवस्थित शहर भी मिलेगा? स्थानीय लोग चाहते हैं कि एनसीएल प्रबंधन ऐसी बसाहट तैयार करे, जहां विस्थापित परिवार एक साथ रह सकें और उनकी सामाजिक पहचान बनी रहे। फिलहाल पुनर्वास योजना को लेकर एनसीएल प्रबंधन की ओर से स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।
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