अमित पांडेय, डोंगरगढ़। कभी जिस घर में परिवार के साथ बैठकर भविष्य की बातें होती थीं, आज वहां जिंदगी बस किसी तरह गुजर रही है। पिता का साया सिर से उठ चुका है, परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा है और सरकारी मदद की उम्मीद में एक आवेदन कलेक्टर कार्यालय की फाइलों में अटका है। अब इसी उम्मीद को लेकर ग्राम लमनाढार निवासी गणेश वर्मा ने छत्तीसगढ़ विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह से न्याय की गुहार लगाई है। गणेश वर्मा ने अपने पत्र में बताया है कि वह नक्सल हिंसा से प्रभावित परिवार से आते हैं। उनके मुताबिक परिवार पहले ही ऐसी त्रासदी झेल चुका है, जिसके बाद सामान्य जिंदगी में लौटना आसान नहीं रहा।

सरकार की नक्सलवादी आत्मसमर्पण एवं पीड़ित राहत पुनर्वास नीति से गणेश वर्मा को उम्मीद बंधी। लगा कि जिस परिवार ने हिंसा का दर्द झेला है, उसके लिए सरकार का पुनर्वास सिर्फ कागज पर नहीं, बल्कि जिंदगी को दोबारा खड़ा करने का सहारा बनेगा। इसी उम्मीद के साथ गणेश ने 31 अगस्त 2026 को कलेक्टर कार्यालय राजनांदगांव में आवेदन दिया। उन्होंने नीति के तहत सरकारी नौकरी के एवज में मिलने वाली 15 लाख रुपए की सहायता राशि दिलाने की मांग की, ताकि अपने परिवार को किसी तरह सम्मान के साथ आगे बढ़ा सकें, लेकिन आवेदन देने के बाद भी इंतजार खत्म नहीं हुआ। दिन बीतते गए। एक-एक करके तारीखें निकलती गईं। परिवार की परेशानियां अपनी जगह बनी रहीं।

गणेश ने अपने पत्र में बेहद भावुक होकर लिखा है कि आवेदन के बाद दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते उनकी चप्पलें घिस गईं, लेकिन उनकी फरियाद सुनने वाला कोई नहीं मिला। उन्होंने लिखा कि अधिकारियों की उदासीनता ने उन्हें मानसिक और आर्थिक रूप से तोड़ दिया है। आखिरकार 30 सितंबर को उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर कहा “जब चारों तरफ अंधेरा दिखने लगा, तब अंतिम आस लेकर आपके चरणों में न्याय की गुहार लगाने आया हूं।”

यह सिर्फ 15 लाख रुपए की मांग का मामला नहीं है। इस पत्र में एक ऐसे परिवार की कहानी दिखाई देती है, जो हिंसा की मार झेलने के बाद अब सरकारी व्यवस्था से अपने हिस्से का सहारा मांग रहा है। गणेश ने विधानसभा अध्यक्ष से आग्रह किया है कि राजनांदगांव कलेक्टर कार्यालय में लंबित उनके आवेदन पर तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिया जाए और नीति के तहत मिलने वाली सहायता राशि जल्द स्वीकृत कराई जाए।

एक तरफ सरकार नक्सल प्रभावित परिवारों को मुख्यधारा से जोड़ने और उन्हें सम्मानजनक जिंदगी देने की बात करती है, दूसरी तरफ एक पीड़ित परिवार अपने आवेदन की सुनवाई के लिए दर-दर भटकने को मजबूर होने का दावा कर रहा है। अब गणेश की नजर उस दरवाजे पर है, जहां से उन्हें सिर्फ जवाब नहीं, बल्कि अपने परिवार के लिए दोबारा जिंदगी शुरू करने का सहारा मिलने की उम्मीद है।

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