Dharm Desk – सावन माह की आहट मिलते ही चारों तरफ शिवभक्ति की एक अलौकिक लहर दौड़ने लगती है. इस बार सावन का यह पावन माह 30 जुलाई से शुरू होकर 28 अगस्त तक चलने वाला है. मंदिरों से लेकर घरों तक में शिवजी के स्वागत की तैयारियां बड़े जोर-शोर से चल रही हैं. इस बार सावन के महीने में चार सावन सोमवार पड़ेंगे. जिनमें 3, 10, 17 और 24 अगस्त को पड़ने वाले हैं. जिन्हें भोलेनाथ का आशीर्वाद पाने के लिए सबसे विशेष और फल दायी माना जाता है.

सावन के महीने में पार्थिव शिवलिंग बनाने और उनके रुद्राभिषेक की परंपरा सदियों से चली आ रही है. मिट्टी से बने ये शिवलिंग सिर्फ पूजा की एक सामग्री नहीं हैं बल्कि ये हमारी गहरी आस्था मन की शांति और प्रकृति से जुड़े हमारे लगाव को दर्शाता हैं. ऐसा माना जाता है कि मिट्टी के शिवलिंग की आराधना करने से जीवन के सारे डर मानसिक तनाव और नकारात्मक ऊर्जा खत्म हो जाती है. पार्थिव शिवलिंग बनाने का रिवाज प्राचीन काल से चला आ रहा है. यह सिर्फ एक धार्मिक कर्मकांड नहीं बल्कि खुद को भगवान से जोड़ने की एक आध्यात्मिक यात्रा है.

पंचतत्वों का संगम हैं शिवलिंग

पार्थिव बनाने में शुद्ध मिट्टी, गाय का गोबर, गुड़, मक्खन और भस्म जैसी पवित्र चीजों का इस्तेमाल किया जाता हैं. जो हमारी पृथ्वी और प्रकृति के स्वरूप को दर्शाती हैं. शिवपुराण के अनुसार, पार्थिव शिवलिंग की पूजा करने वाले मनुष्य को सभी सांसारिक कष्टों और भयों से मुक्ति मिलती है तथा अपार आत्मिक शांति का अहसास होता है और मन को स्थिर और शांत करने का एक अनूठा माध्यम हैं. वही अगर व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक नजरिए से देखें तो पार्थिव शिवलिंग बनाना इंसान को अंदर से शांत करता है.

पार्थिव शिवलिंग बनाने के फायदे

  1. पार्थिव शिवलिंग बनाने से एकाग्रता में बढ़ोतरी होती हैं अपनी उंगलियों से मिट्टी को ढालकर शिवलिंग का आकार देना और साथ में मंत्रों का जाप करना इंसान के भटके हुए मन को एक जगह केंद्रित कर देता है.
  2. पार्थिव शिवलिंग बनाने की प्रक्रिया मन में जमा नकारात्मक सोच और भागदौड़ भरे जीवन के तनाव को दूर करने में बहुत मददगार साबित होती है. यही वजह है कि आज की भागम भाग वाली जिंदगी में भी लोग इस परंपरा से जुड़कर मानसिक सुकून की तलाश करते हैं.
  3. सामूहिक पूजन से सामाजिक भाईचारा बढ़ता है क्योंकि सावन के महीने में लोग जगह-जगह एकत्रित होकर समूह बनाकर पार्थिव शिवलिंग बनाते हैं और एक साथ उनका पूजन करते हैं. जब कई लोग एक पवित्र उद्देश्य के साथ एक जगह जुटते हैं तो वहां की पूरी आबोहवा ही सकारात्मक ऊर्जा से भर जाती है. यह परंपरा हमारी धार्मिक भावना को मजबूत करने के साथ-साथ समाज को आपस में जोड़ने का काम भी करती है. परिवार और समाज के लोग जब एक साथ बैठकर भगवान की आराधना करते हैं, तो आपसी रिश्तों में कड़वाहट खत्म होती है और सामाजिक एकता को भी बढ़ावा मिलता है.