राजधानी दिल्ली में फुटपाथों पर अतिक्रमण और अवैध पार्किंग की समस्या को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने सख्त नाराजगी जाहिर की है। फुटपाथों से अतिक्रमण हटाने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि राजधानी में हालात ऐसे हैं कि फुटपाथ तो दूर, सड़कों तक का इस्तेमाल पार्किंग के लिए किया जा रहा है। मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नितिन वासुदेव सांब्रे और न्यायमूर्ति संजय शर्मा की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि आप फुटपाथों पर अतिक्रमण की बात कर रहे हैं, जबकि यहां तो सड़कों पर भी गाड़ियां खड़ी की जा रही हैं।
‘यह आपके ही साथी वकीलों की वजह से है’
पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील को संबोधित करते हुए यह भी कहा कि यह स्थिति आपके ही साथी वकीलों की वजह से है। अदालत की इस टिप्पणी के जरिए हाईकोर्ट के आसपास वाहनों की पार्किंग से पैदा हो रही समस्या की ओर ध्यान दिलाया गया। वहीं, याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि जयपुर हाउस से दिल्ली हाईकोर्ट तक के रास्ते पर फुटपाथों का इस्तेमाल वाहनों की पार्किंग के लिए किया जा रहा है। इससे पैदल चलने वाले लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
याचिकाकर्ता ने अपनी दलील के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का भी हवाला दिया। इस फैसले में पैदल यात्रियों के फुटपाथ पर चलने के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि वाहन चालक पैदल यात्रियों के इस अधिकार को खत्म नहीं कर सकते। शीर्ष अदालत ने पैदल चलने वालों के लिए बुनियादी ढांचे की सुरक्षा और उसे सुरक्षित बनाए रखने के महत्व पर भी जोर दिया था।
कई मामले अदालत में लंबित
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की पीठ ने कहा कि अतिक्रमण से जुड़े कई मामले पहले से ही अदालत में लंबित हैं। इस दौरान पीठ ने 20 सितंबर 2018 को एक रिट याचिका के संबंध में पारित आदेश का भी उल्लेख किया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) की ओर से गठित स्पेशल टास्क फोर्स का भी जिक्र किया। पीठ ने संकेत दिया कि अतिक्रमण से संबंधित शिकायतों के लिए संबंधित अधिकारियों और टास्क फोर्स के समक्ष जाने का रास्ता उपलब्ध है।
टास्क फोर्स के सामने शिकायत रखने की छूट
इसके बाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपनी शिकायतें रखने की छूट दे दी। खंडपीठ ने निर्देश दिया कि 20 सितंबर 2018 के आदेश की प्रति याचिकाकर्ता को उपलब्ध कराई जाए। वहीं, याचिकाकर्ता ने उक्त आदेश का अध्ययन करने के लिए अदालत से समय मांगा। इस पर पीठ ने कहा कि वे अपनी शिकायत संबंधित टास्क फोर्स के समक्ष रख सकते हैं। वहां की कार्रवाई और रुख देखने के बाद याचिकाकर्ता पीठ के सामने अपना जवाब पेश करेंगे। हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद तय की है। अब याचिकाकर्ता संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपनी शिकायत रखेंगे और वहां से मिले जवाब के आधार पर अदालत के सामने अपना पक्ष पेश करेंगे।
अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों पर उठे सवाल
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों को साबित करने के लिए कानून के तहत निर्धारित आवश्यक तत्वों का होना जरूरी है। लेकिन अभियोजन पक्ष की ओर से पेश की गई सामग्री इन अपराधों को स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। गौरतलब है कि अनिसिया बत्रा की वर्ष 2018 में मौत हुई थी। इस मामले में उनके पति मयंक सिंघवी के खिलाफ पत्नी के साथ क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप लगाए गए थे। अब दिल्ली हाईकोर्ट ने दोनों आरोपों से उन्हें बरी कर दिया है।
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