प्रतापगढ़ के कुंडा में मारे गए पूर्व पुलिस उपाधीक्षक जियाउल हक के पिता हाजी शमसुल हक ने हालिया सीबीआई कोर्ट के फैसले पर गहरा असंतोष व्यक्त किया है. देवरिया जिले के निवासी शमसुल हक ने अपने बेटे के असली दोषियों को सजा दिलाने की मांग करते हुए पारिवारिक विवाद का भी जिक्र किया.
प्रतापगढ़. जिले के कुंडा में मार्च 2013 को हुए तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक (सीओ) जियाउल हक हत्याकांड मामले में सीबीआई कोर्ट के फैसले के बाद परिजनों की प्रतिक्रिया सामने आई है. देवरिया जिले के खुखुंदू थाना क्षेत्र अंतर्गत जुआफर गांव निवासी जियाउल हक के पिता हाजी शमसुल हक और माता हाजरा खातून ने इस अदालती निर्णय पर गहरा असंतोष जताया है. हाजी शमसुल हक का कहना है कि बेटे को खोने के बाद वे केवल न्याय की उम्मीद में जी रहे थे, परंतु इस फैसले से उनके परिवार को गहरा आघात पहुंचा है.
गरीबी में पढ़ाया, फिर हुआ हादसा
हाजी शमसुल हक ने बताया कि आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने अपने बेटे जियाउल हक की प्राथमिक शिक्षा गांव के स्कूल से पूरी कराने के बाद उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए प्रयागराज भेजा था. बेटे के पुलिस अफसर बनने से परिवार का सपना साकार हुआ था, लेकिन मार्च 2013 की घटना ने सब कुछ बदल दिया. उन्होंने कहा कि वे आज भी बेटे के असल दोषियों को कानून के तहत सजा मिलने का इंतजार कर रहे हैं.
बहू से संपत्ति का कानूनी विवाद
सीओ जियाउल हक के पिता ने पारिवारिक संबंधों में आई कड़वाहट का जिक्र करते हुए बताया कि बेटे की मृत्यु के बाद बहू डॉ. परवीन आजाद को नौकरी मिल गई, जिसके बाद उनका गांव आना-जाना बंद हो गया. उन्होंने आरोप लगाया कि जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की धनराशि के बाद अब चल-अचल संपत्ति को लेकर बहू द्वारा कानूनी कार्यवाही की गई है. इस संपत्ति विवाद मामले में आगामी 28 सितंबर को अदालत में सुनवाई तय है.
बुढ़ापे में अदालती चक्कर
शमसुल हक ने व्यथा व्यक्त करते हुए कहा कि लखनऊ जाने पर बहू ने उनसे मिलने से मना कर दिया और मामला सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने की बात कही. उन्होंने कहा कि एक तरफ जहां उन्होंने अपना बेटा खो दिया, वहीं दूसरी ओर बुढ़ापे की इस उम्र में उन्हें हर महीने चल-अचल संपत्ति से जुड़े मुकदमे की पैरवी के लिए अदालतों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं.



