पुष्पेंद्र कुमार, चरखी दादरी। हरियाणा के चरखी दादरी में राष्ट्रव्यापी खेत बचाओ अभियान के तहत एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया गया। उपमंडल बाढड़ा में कृषि एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा आयोजित इस एक दिवसीय किसान जागरूकता और तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रम में किसानों को खेती से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियां दी गईं। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचीं जानी-मानी मृदा वैज्ञानिक यानी मिट्टी की डॉक्टर ममता फौगाट ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि स्वस्थ मिट्टी, सशक्त किसान और सुरक्षित भविष्य ही हमारी खेती का असली मूल मंत्र होना चाहिए।
समय-समय पर कराएं मिट्टी की जांच
डॉ. ममता फौगाट ने जमीन की उपजाऊ शक्ति को हमेशा बनाए रखने के लिए किसानों से एक खास अपील की। उन्होंने कहा कि किसानों को नियमित अंतराल पर अपने खेतों की मिट्टी की जांच जरूर करवानी चाहिए। उन्होंने समझाया कि मिट्टी की सेहत बताने वाले सरकारी कार्ड यानी सॉइल हेल्थ कार्ड की रिपोर्ट के आधार पर ही खेतों में जरूरत के अनुसार संतुलित मात्रा में रासायनिक खाद, जैविक खाद और हरी खाद का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
प्राकृतिक खेती से सुधरेगा भूजल स्तर
मिट्टी वैज्ञानिक ने प्राकृतिक खेती के फायदों के बारे में विस्तार से बात की। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक तरीके से खेती करने से न केवल जमीन के प्राकृतिक गुण सुरक्षित रहते हैं, बल्कि इससे जमीन के नीचे का पानी यानी भूजल स्तर भी सुधरता है। कार्यक्रम में मौजूद कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को घर पर ही जीवामृत तैयार करने का सही तरीका सिखाया। इसके साथ ही बीजों को बोने से पहले उनका वैज्ञानिक तरीके से उपचार करने और फसलों की सही देखरेख के व्यावहारिक गुर भी सिखाए गए।
कम्पोस्ट और जैव उर्वरक के इस्तेमाल पर जोर
विशेषज्ञों ने मिट्टी में फसलों को फायदा पहुंचाने वाले मित्र कीड़ों और सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ाने के तरीके बताए। इसके लिए गोबर की खाद, केचुआ खाद यानी वर्मी कम्पोस्ट और बायो-फर्टिलाइजर का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने के लिए कहा गया। किसानों को यह भी सलाह दी गई कि वे हर साल खेत में एक ही फसल न उगाएं, बल्कि फसल चक्र अपनाएं यानी बदल-बदल कर फसलें बोएं। इससे जमीन के जरूरी पोषक तत्व प्राकृतिक रूप से बने रहते हैं और जमीन की पैदावार लंबे समय तक कम नहीं होती है।
केमिकल के अंधाधुंध इस्तेमाल से बढ़ रही लागत
डॉ. फौगाट ने किसानों को सावधान करते हुए कहा कि खेतों में रासायनिक खादों का बिना सोचे-समझे बहुत ज्यादा इस्तेमाल करने से खेती की लागत लगातार बढ़ रही है और इससे हमारा पर्यावरण भी दूषित हो रहा है। अगर मिट्टी की जांच के बाद जरूरत के मुताबिक ही पोषक तत्व दिए जाएं, तो फसलों की गुणवत्ता में बड़ा सुधार होता है, पर्यावरण का नुकसान कम होता है और किसानों की शुद्ध कमाई में भी बढ़ोतरी होती है।
पारंपरिक खेती के साथ अपनाएं पशुपालन और बागवानी
बढ़ती आबादी और खेती के लिए कम होती जमीन को देखते हुए कृषि विभाग के अधिकारियों ने किसानों को एक साथ कई तरह की खेती से जुड़ने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि पारंपरिक फसलों को उगाने के साथ-साथ अगर किसान पशुपालन, बागवानी, मधुमक्खी पालन, मछली पालन और मशरूम उत्पादन जैसे कामों को भी एक साथ जोड़ेंगे, तो खेती में नुकसान का खतरा बहुत कम हो जाएगा और किसानों की आजीविका को एक मजबूत और स्थाई आधार मिलेगा।
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