Delhi Usha Rani Loan Fraud Case: देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से फर्जीवाड़ा, धोखाधड़ी और घोटाले का सनसनीखेज मामला सामने आया है। फर्जीवाड़ा, धोखाधड़ी और घोटाले के कॉकटेल मिश्रण को देखकर दिल्ली पुलिस (Delhi Police) भी शॉक्ड हो गई। मामला फर्जी लोन लेना का है। पूर्वी दिल्ली के विवेक विहार में किराएदारों ने मकान मालिक के नाम पर ही 18 करोड़ का लोन (18 crore loan) ले डाला। इसके बाद फरार हो गए। मामले का खुलासा तब हुआ, जब जब सुप्रीम कोर्ट के दो वकील उनके दरवाजे पर पहुंचे। 2012 के इस केस में पुलिस और CBI जांच में फ्रॉड का बड़ा नेटवर्क सामने आया है।
दिल्ली पुलिस के मुताबिक पूरा मामला 2012 का है। विवेक विहार में रहने वाली 55 वर्षीय ऊषा रानी से आमदानी को देखते हुए ब्लॉक-डी में अपने 4 फ्लैटों में से दो फ्लैट किराए पर उठा दिए थे। नके पास घर ढूंढते आए सचिन ने खुद को जगदम्बा मेटल्स का मालि बताया और 47000 रुपये महीने में दूसरी फ्लोर का फ्लैट लिया। जबकि उसके साथ आए संजय ने तीसरे फ्लोर पर 17 हजार रुपये महीने में छोटा फ्लैट किराए पर लिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ दिन तक फ्लैटों में सही रहने के बाद दोनों किराएदार घर छोड़कर चले गए। वहीं ऊषा रानी भी इन्हें भूल गईं। दिन बीतते गए और साल 2013 में अचानक सुप्रीम कोर्ट के दो वकील ऊषा रानी के घर पहुंचे। उन पर 70 लाख रुपये का पंजाब एंड सिंध बैंक से लोन लेने और न चुकाने का मामला दर्ज है। साथ ही पूछा कि उन्होंने लोन क्यों नहीं चुकाया है? इसके बाद पीड़ित ऊषा रानी पुलिस स्टेशन पहुंचीं और शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने जांच की तो ऊषा रानी के पैरों के तले जमीन उस समय खिसक गई, जब उन्हें पता चला कि उनके नाम पर सिर्फ 70 लाख रुपये नहीं बल्कि 18 करोड़ रुपये का लोन है। ये 18 करोड़ का लोन ऊषा रानी के दोनों फ्लैट पर लिए गए थे। किराएदारों ने फर्जी डॉक्यूमेंट्स के सहारे ये लोन लिए थे।
11 अलग-अलग शेल कंपनियों में घुमाया पैसा
यह लोन का पैसा 11 अलग-अलग शेल कंपनियों के जरिए घुमाया गया था। पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने संपत्ति की बिक्री से जुड़े दस्तावेज और मालिकाना कागजात ट्रांसफर कर बैंक में जमा कर दिए। बाद में पता चला कि दस्तावेजों में ऊषा के पति पंचानंद के नाम और PAN कार्ड की कॉपी का इस्तेमाल किया गया था, लेकिन हस्ताक्षर असली नहीं थे। जांच में पता चला कि एक महिला ने खुद को ऊषा बताकर फरवरी में सब-रजिस्ट्रार ऑफिस का दौरा किया था। उसने दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया को चकमा देकर संपत्ति के कागज अपने नाम करवाने की कोशिश की थी।
मामले में एक गिरफ्तार
संपत्ति पहले सचिन के नाम ट्रांसफर की गई थी, लेकिन कुल 18 करोड़ रुपये का लोन उसके और उसके साले संजीव ने लिया था। शिकायत के बाद CBI और ACB भी जांच में शामिल हुईं। 2017 में पुलिस ने आरोपी उपेंद्र दीक्षित को गिरफ्तार किया। पुलिस के मुताबिक, वह गिरफ्तारी से बचने के लिए लंबे समय तक फरार चल रहा था। यह वही व्यक्ति था जिसे जनवरी 2011 में CBI ने धोखाधड़ी के मामले में गिरफ्तार किया था। उसके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत भी केस दर्ज था।
कैसे हुआ ये घोटाला
पुलिस के मुताबिक सचिन और संजय ने जानबूझकर इस फ्रॉड को अंजाम दिया था। वे प्लान के तहत ही घर ढूंढ़ने के लिए ऊषा रानी के घर पहुंचे थे। दोनों काम सिर्फ ऊषा रानी से रेंट एग्रीमेंट लेना था, ताकि वह ऊषा रानी की प्रॉपर्टी की पूरी जानकारी हासिल कर सके। किराया चुकाने के लिए पैन कार्ड हासिल कर सके, जिसके सहारे वह फ्रॉड को अंजाम दे सकें।
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