सुरेश पांडेय, सिंगरौली। मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले के सरकारी स्कूलों में काम कर रही गैर सरकारी संस्था एजुकेट गर्ल्स की कार्यप्रणाली पर अब सवाल खड़े हो गए हैं। संस्था के स्कूलों में काम करने के अधिकार और विद्यार्थियों की जानकारी जुटाने को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। जिला परियोजना समन्वयक अधिकारी रामलखन शुक्ला ने कहा है कि संस्था की ओर से संतोषजनक जानकारी नहीं दी गई है और मंगलवार को आदेश जारी कर जिले में संस्था का काम बंद किया जा सकता है।
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दरअसल, एजुकेट गर्ल्स संस्था द्वारा सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में बालिकाओं के नामांकन और लर्निंग सपोर्ट का कार्य करने का दावा किया जाता है। लेकिन अब संस्था की गतिविधियों को लेकर कई गंभीर सवाल सामने आए हैं। आरोप है कि संस्था के साथी एक साथ कई कक्षाओं के बच्चों को बैठाकर गतिविधियां संचालित कर रहे हैं। कक्षा 3, 4 और 5 के विद्यार्थियों को एक साथ तथा कक्षा 6, 7 और 8 के विद्यार्थियों को एक साथ पढ़ाने की बात सामने आई है।
कुछ दिन पहले पत्रकारों ने जिला परियोजना समन्वयक अधिकारी रामलखन शुक्ला से संस्था के काम करने के आदेश और अनुबंध को लेकर सवाल किया था। उस समय अधिकारी ने बताया था कि उनके पास राज्य शिक्षा केंद्र का कोई अनुबंध पत्र उपलब्ध नहीं है और जल्द जानकारी देने की बात कही थी।
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सोमवार को जब दोबारा जानकारी मांगी गई तो डीपीसी ने बताया कि संस्था की ओर से अभी तक कोई संतोषजनक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। उन्होंने कहा कि तकनीकी समस्या के कारण सोमवार को पत्र जारी नहीं हो सका, लेकिन मंगलवार को आदेश जारी किया जाएगा कि जिले में एजुकेट गर्ल्स संस्था अब कोई कार्य नहीं करेगी।
वहीं सबसे बड़ा सवाल विद्यार्थियों की निजी जानकारी को लेकर भी उठ रहा है। सूत्रों के अनुसार संस्था के कार्यकर्ता घर-घर सर्वे कर बच्चों की सूची तैयार करते हैं और बाद में विद्यालयों से प्रवेश पंजी में दर्ज विद्यार्थियों की जानकारी जैसे नाम, माता-पिता का नाम, जन्मतिथि, समग्र आईडी और अन्य विवरण अपने एप या निर्धारित फॉर्मेट में दर्ज करते हैं।
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सवाल यह है कि यदि संस्था के पास कोई स्पष्ट विभागीय आदेश या अधिकृत अनुमति नहीं है तो विद्यालयों से इतनी महत्वपूर्ण जानकारी किस आधार पर साझा की जा रही है। अब सबकी नजर मंगलवार को जारी होने वाले आदेश पर टिकी है। देखना होगा कि क्या जिले में एजुकेट गर्ल्स संस्था की गतिविधियों पर रोक लगती है या फिर पूरे मामले की विभागीय जांच कराई जाती है। वहीं यह सवाल भी बना हुआ है कि जब सर्वे, नामांकन और शिक्षण की जिम्मेदारी सरकारी शिक्षकों की है तो बाहरी संस्था को यह जिम्मेदारी किस आधार पर दी गई।
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