बॉम्बे हाईकोर्ट की कोल्हापुर बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से इस्लाम धर्म अपना लेता है, तो वह अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST एट्रोसिटी एक्ट) के तहत मिलने वाली कानूनी सुरक्षा का दावा नहीं कर सकता। हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि धर्म परिवर्तन का प्रभाव भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत दर्ज अन्य आपराधिक आरोपों पर नहीं पड़ेगा।
क्या था पूरा मामला?
मामला एक पारिवारिक संपत्ति विवाद से जुड़ा था। वर्ष 2015 में महिला की ननद और नंदोई उसके घर रहने आए थे। इसी दौरान स्वच्छता, पानी के सीमित उपयोग और शौचालय की सफाई को लेकर दोनों पक्षों में विवाद हो गया। महिला ने आरोप लगाया कि रिश्तेदारों ने उसके साथ मारपीट की और उसकी पूर्व जाति को जानते हुए जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया। इसके आधार पर उसने SC/ST एट्रोसिटी एक्ट समेत अन्य धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई थी।
कोर्ट में क्या सामने आया?
सुनवाई के दौरान महिला ने अदालत को बताया कि विवाह के समय उसने अपने मुस्लिम पति के साथ इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था। धर्म परिवर्तन के बाद उसने अपना नाम भी बदल लिया और तब से वह मुस्लिम धर्म का पालन कर रही है।
आरोपियों की ओर से अधिवक्ता सत्यव्रत जोशी ने दलील दी कि यह पारिवारिक और संपत्ति से जुड़ा सिविल विवाद है तथा झूठी एफआईआर दर्ज कराई गई है। वहीं, अतिरिक्त लोक अभियोजक एस. वी. गवंड ने भी सुप्रीम कोर्ट के ‘चिंथाडा आनंद’ फैसले का हवाला देते हुए कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद महिला SC/ST एट्रोसिटी एक्ट का लाभ लेने की पात्र नहीं रह जाती।
हाईकोर्ट का फैसला
न्यायमूर्ति वृषाली वी. जोशी की एकल पीठ ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद आरोपी दंपति को SC/ST एट्रोसिटी एक्ट के तहत लगाए गए आरोपों से मुक्त कर दिया। अदालत ने कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद उक्त अधिनियम के प्रावधान लागू नहीं होते।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि एफआईआर में दर्ज भारतीय दंड संहिता की अन्य धाराओं के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है। इसलिए आरोपियों को उन आरोपों का मुकदमा अदालत में जारी रखना होगा।
Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m

