इलॉन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स सबसे ताकतवर रॉकेट ‘स्टारशिप’ की 14वीं टेस्ट उड़ान के लिए तैयार है। यह पहली बार होगा जब स्टारशिप को पृथ्वी की ऑर्बिट में भेजा जाएगा। इसकी लॉन्चिंग सोमवार, 28 सितंबर को भारतीय समयानुसार शाम 5:45 बजे से होगी। स्टारशिप स्पेसक्राफ्ट (ऊपरी हिस्सा) और सुपर हैवी बूस्टर (निचला हिस्सा) को कलेक्टिवली ‘स्टारशिप’ कहा जाता है। इस व्हीकल की ऊंचाई 403 फीट है।
ऑर्बिटल और सब-ऑर्बिटल ट्रैजेक्टरी में अंतर
सब-ऑर्बिटल ट्रैजेक्टरी: इसमें रॉकेट अंतरिक्ष की सीमा तक तो पहुंचता है, लेकिन वह पृथ्वी की गति और खिंचाव के कारण चक्कर लगाए बिना वापस नीचे गिर जाता है।
ऑर्बिटल ट्रैजेक्टरी: इसमें रॉकेट इतनी तेज रफ्तार और सही कोण पर उड़ता है कि वह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण को संतुलित करते हुए लगातार कक्षा में चक्कर लगाने लगता है।
10 घंटे का सफर, पृथ्वी के लगाएगा 6 चक्कर
इस मिशन में स्टारशिप जमीन से लगभग 275 किलोमीटर की ऊंचाई पर उड़ेगा। करीब 10 घंटे लंबे इस सफर में यह पृथ्वी के 6 चक्कर पूरे करेगा। मिशन खत्म होने के बाद रॉकेट चिली देश के पास प्रशांत महासागर में सुरक्षित पानी पर लैंड यानी स्प्लैशडाउन करेगा।
पहली बार स्पेस में छोड़े जाएंगे 26 नए स्टारलिंक सैटेलाइट्स
इस उड़ान से पहली बार नई तकनीक वाले 26 ‘स्टारलिंक V3’ सैटेलाइट्स अंतरिक्ष में भेजे जा रहे हैं। इनसे पूरी दुनिया में इंटरनेट की स्पीड और नेटवर्क काफी बेहतर हो जाएगा। इस नए मॉडल का सिर्फ एक सैटेलाइट ही नेटवर्क में 1 टेराबिट प्रति सेकंड (Tbps) की डेटा क्षमता जोड़ देगा, यानी इस अकेले मिशन से कुल 26 Tbps की क्षमता जुड़ जाएगी, जो कि फॉल्कन 9 रॉकेट से भेजे जाने वाले छोटे सैटेलाइट्स के मुकाबले लगभग 10 गुना ज्यादा है।
रॉकेट से अलग होते ही ये सैटेलाइट अपने एंटीना और सोलर पैनल खोल लेंगे और रेडियो तरंगों व लेजर के जरिए जमीन तथा बाकी सैटेलाइट्स से संपर्क साधेंगे। इसके बाद वे अपने छोटे इंजनों की मदद से तय कक्षा में पहुंच जाएंगे और सभी शुरुआती जांचों के बाद इंटरनेट सर्विस देना शुरू कर देंगे।
3 सैटेलाइट्स में कैमरे लगे हैं, स्टारशिप की करेंगे निगरानी
इस मिशन में शामिल 3 सैटेलाइट्स को खास तौर पर बदला गया है। इनमें हाई-टेक कैमरे लगाए गए हैं। ये कैमरे अंतरिक्ष में स्टारशिप की ‘हीटशील्ड’ यानी गर्मी से बचाने वाली बाहरी परत को स्कैन करेंगे और तस्वीरें सीधे जमीन पर मौजूद वैज्ञानिकों को भेजेंगे।
इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि धरती पर लौटते वक्त स्टारशिप की हीटशील्ड कितनी सुरक्षित रहती है। ये तस्वीरें और टेस्ट के रिजल्ट भविष्य में रॉकेट को लॉन्च पैड पर वापस सुरक्षित उतारने के काम आएंगे।
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