अभय मिश्रा, मऊगंज। मध्य प्रदेश के नवनिर्मित जिले मऊगंज से भ्रष्टाचार की शर्मनाक तस्वीर सामने आई है, जिसने पूरे प्रशासनिक अमले को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जहां एक तरफ सरकार गोवंश के संरक्षण के लिए करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा रही है, वहीं मऊगंज में पशुपालन विभाग के उपसंचालक (डिप्टी डायरेक्टर) जे.एल. साकेत और गौशाला संचालकों की मिलीभगत से लगभग 50 करोड़ के महाघोटाले को अंजाम दिया जा चुका है।
इस घोटाले की परतें इतनी घिनौनी हैं कि जिन गौशालाओं में एक भी गाय नहीं है, जहां महीनों से ताले लटके हैं, वहां कागजों पर हजारों गाय जिंदा दिखाकर हर दिन कई लाखों रुपए का अनुदान डकारा जा रहा है। हद तो तब हो गई जब रिश्वत का लेन-देन भी सीधे बैंक चेक के जरिए हुआ और उन्हीं पैसों से डिप्टी डायरेक्टर ने बेरोजगार बेटे पुनीत कुमार साकेत के नाम पर रीवा में आलीशान मकान खरीद लिया।
आंकड़ों की बाजीगरी: कागजों पर 24 हजार गोवंश, जमीन पर सन्नाटा
‘गौ संवर्धन पोर्टल’ के सरकारी आंकड़ों को देखें तो मऊगंज जिले में कुल 77 गौशालाएं संचालित हैं:
- नईगड़ी: 14 गौशालाएं (2,213 गोवंश)
- मऊगंज: 31 गौशालाएं (12,388 गोवंश)
- हनुमना: 32 गौशालाएं (9,539 गोवंश)
पोर्टल के मुताबिक, जिले में कुल 24,140 गोवंश मौजूद हैं। सरकार प्रति गोवंश 40 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से चारा-भूसा के लिए अनुदान देती है। इस लिहाज से:
- प्रतिदिन का खर्च: 9,65,600
- 30 दिन (एक महीना) का खर्च: ₹2,89,68,000 (लगभग 2.90 करोड़)
सूचना के अधिकार (RTI) से मिले दस्तावेजों और ब्लॉक वेटरिनरी ऑफिसर की रिपोर्ट बताती है कि यह खेल पिछले 25 महीनों से अधिक समय से लगातार चल रहा है। 25 महीनों के इस खर्च को जोड़ा जाए तो यह आंकड़ा 50 करोड़ रुपए के पार निकल जाता है। हैरानी की बात यह कि मऊगंज की अधिकांश गौशालाओं की क्षमता मात्र 150 से 250 गोवंश रखने की है। यानी पूरे जिले में किसी भी हालत में 15,000 से अधिक गोवंश नहीं रखे जा सकते, लेकिन कागजों पर क्षमता से कई गुना अधिक (24 हजार से ज्यादा) गोवंश दिखाकर करोड़ों का चूना लगाया गया।
ग्राउंड रियलिटी चेक
56 गौशालाओं का सच, कहीं पैर बंधे तो कही हड्डियों का ढेर, तो कहीं सिर्फ चरवाहे… ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन के दौरान टीम ने खुद 56 गौशालाओं का दौरा किया। जो सच सामने आया, वह हैरान करने वाला था:
- कुल 56 गौशालाओं में सिर्फ 3,278 गोवंश ही मौके पर मिले।
- मलैगवा, बिछरहटा, सरदमन, हर्रई प्रताप सिंह, नाउन खुर्द, बेलहा, भाटी, खैरा और पथरौड़ा की गौशालाओं में एक भी गाय मौजूद नहीं थी।
- जांच की गई गौशालाओं में से केवल 7 में भूसा मिला, बाकी सब जगह खाली भंडार गृह और सन्नाटा था। पानी तक की व्यवस्था नहीं थी।
- सरदवन गौशाला का मंजर तो रूह कपांने वाला था, जहाँ गोवंश के पैर बांधकर रखे गए थे और गाएं तड़प-तड़प कर दम तोड़ रही थीं।
- किसी भी गौशाला में कैश बुक (Cash Book) उपलब्ध नहीं थी।
आपको बता दे कि इससे पहले खुद ब्लॉक विटनरी ऑफिसर ने इस बात को स्वीकार किया है कि किसी भी गौशाला में कैश बुक नहीं है, यही अब बड़ा सवाल यह है कि यदि चारा-भूसा खरीदा गया, तो उसके बिल-वाउचर कहां हैं? साफ है कि कोई खरीदी हुई ही नहीं, सिर्फ पैसा निकाला गया।
महाघोटाले की सबसे बड़ी ‘कड़ी’: बेलहा गौशाला का 42 लाख का फर्जीवाड़ा
भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा देखनी हो तो ग्राम पंचायत बेलहा की गौशाला को देखिए। इस गौशाला का भवन आज तक अधूरा है, पंचायत ने पूर्णता प्रमाण पत्र भी जारी नहीं किया है, लेकिन यहां गोवंश के नाम पर कुछ महीने पहले 42,57,800 रुपए निकाल लिए गए।
- 22 मार्च 2025: एक संयुक्त जांच दल ने मौका मुआयना किया और रिपोर्ट दी कि यहां एक भी गोवंश नहीं है।
- 23 अक्टूबर 2025: जब एक शिकायतकर्ता रामलाल कोल ने उपसंचालक से जानकारी मांगी, तो उपसंचालक जे.एल. साकेत ने पत्र क्रमांक 253 जारी कर लिखित में दिया कि ‘मां शारदा समिति’ की ओर से संचालित इस गौशाला को कोई अनुदान प्राप्त नहीं हुआ है।
- 20 दिसंबर 2025: उपसंचालक के इस लिखित झूठ के ठीक दो महीने बाद अक्टूबर माह तक की 42.57 लाख की राशि चुपचाप जारी कर दी गई।
इस संबंध में उप-सरपंच ने मऊगंज कलेक्टर से शिकायत की। यहां तक कि 7 नवंबर 2025 को क्षेत्रीय विधायक प्रदीप पटेल ने विधानसभा में इस पर सवाल उठाया और खुद बेलहा गौशाला का निरीक्षण किया (जिसमें उपसंचालक भी साथ थे), लेकिन उपसंचालक ने विधानसभा को भी आधी-अधूरी और गुमराह करने वाली जानकारी भेज दी इसी तरह विकासखंड पशु चिकित्सा अधिकारी के पत्र (क्रमांक 93/2025, दिनांक 17.08.2025) के अनुसार, हर-हर नर्मदे गौशाला’ में मौके पर सिर्फ 20 गाय थीं, लेकिन कागजों में 297 दर्ज कर भुगतान ले लिया गया। वहीं दामोदरगढ़ की गौशाला में दरवाजे तक नहीं लगे है, गौवंश मौजूद नहीं है, लेकिन इसके बाद भी भुगतान जारी कर दिया गया है।
रिश्वत के चेक से खरीदा साहब के बेटे के नाम ‘आशियाना’ (पुख्ता प्रमाण)
अब सवाल उठता है कि भ्रष्टाचार की यह मलाई जा कहां रही थी? इसका सीधा कनेक्शन उपसंचालक जे.एल. साकेत के परिवार से जुड़ता है। हाल ही में रीवा में राम उजागर अवधिया नामक व्यक्ति से 37 लाख रुपए (रजिस्ट्री व अन्य खर्च मिलाकर करीब 42 लाख रुपए) में एक मकान खरीदा गया। यह मकान उपसंचालक के बेटे पुनीत कुमार साकेत के नाम पर दर्ज हुआ, जिसकी कमाई का कोई जरिया नहीं है।
रजिस्ट्री के दस्तावेजों से खुला रिश्वत का खेल
- 15 जुलाई 2025 (चेक क्रमांक 101807): राम उजागर अवधिया को 7 लाख रुपए का चेक दिया गया। यह चेक किसी और का नहीं, बल्कि मऊगंज जनपद की एक गौशाला संचालक का था, जिसने उपसंचालक जे.एल. साकेत को रिश्वत के तौर पर दिया था। साकेत ने यह चेक सीधे मकान मालिक को थमा दिया, लेकिन रजिस्ट्री में चालाकी से भुगतानकर्ता के रूप में बेटे पुनीत कुमार साकेत का नाम लिखवा दिया।
- दलाल और ‘गौ मित्र’ की भूमिका: उपसंचालक का खासमखास और ‘गौ मित्र’ सदानंद पाठक इस पूरे सिंडिकेट का मुख्य दलाल है। पाठक गौशाला संचालकों से अपने खाते में पैसा लेता था।
- चेक का पूरा ट्रेल: चेक क्रमांक 101808 (2 लाख रु), चेक क्रमांक 101810 (2.5 लाख रु), और चेक क्रमांक 101813 (1 लाख रु) के जरिए सदानंद पाठक ने पैसे लिए और स्टेट बैंक के चेक के माध्यम से यह साढ़े 5 लाख रुपए सीधे मकान मालिक को ट्रांसफर कर दिए गए।
जांच हुई तो नपेंगे कई बड़े ‘सफेदपोश’ और अधिकारी
यह मऊगंज जिले का अब तक का सबसे सुनियोजित और संगठित भ्रष्टाचार है, जहां बेजुबान गायों के नाम पर करोड़ों रुपए डकार लिए गए। पोर्टल पर एंट्री से लेकर वेरिफिकेशन तक का पूरा खेल ‘सेटिंग’ के आधार पर चल रहा है। जो गौशाला संचालक अधिकारियों को हिस्सा नहीं देता, उसकी गायों की संख्या घटा दी जाती है, और जो भ्रष्टाचार में शामिल है, उसे बिना गायों के भी लाखों का भुगतान कर दिया जाता है।
उपसंचालक जे.एल. साकेत, उनके बेटे पुनीत साकेत, दलाल सदानंद पाठक और मकान मालिक के बैंक खातों की यदि उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच (ED या लोकायुक्त) कराई जाए, तो 50 करोड़ के इस महाघोटाले में कई और बड़े चेहरों के बेनकाब होना तय है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या मऊगंज जिला प्रशासन और सूबे की सरकार इन बेजुबान गायों के गुनहगारों पर कार्यवाही करेगी या फिर कागजी घोड़ों के सहारे इस महाघोटाले को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा? क्योंकि भ्रष्टाचार के कई प्रमाण मौजूद है और रिश्वत भी ली गई है और उसी रिश्वत के पैसे से रीवा में घर भी खरीदा गया है ? आखिर उसके बाद भी कार्यवाही क्यों नहीं हो रही है? क्या जान बूझ कर भ्रष्टाचारियों को बचाया जा रहा है ? या इस भ्रष्टाचार में किसी और बड़े अधिकारी का हाथ है।

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