लखनऊ. उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने उच्च शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा को बढ़ावा देने के लिए नई नीति लागू की है. इसके तहत केवल वे विश्वविद्यालय और महाविद्यालय ‘भारतीय ज्ञान परंपरा संवर्धन शोधपीठ’ की स्थापना के लिए आवेदन कर सकेंगे, जिनकी स्थापना को कम से कम 50 वर्ष पूरे हो चुके हों, जिनमें 5,000 से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हों तथा जो यूजीसी अधिनियम, 1956 की धारा 2(एफ) और 12(बी) के तहत मान्यता प्राप्त हों. चयनित प्रत्येक संस्थान को शोधपीठ की स्थापना और संचालन के लिए पांच वर्षों के लिए दो करोड़ रुपये का एकमुश्त अनुदान दिया जाएगा.
उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने कहा कि योगी सरकार चाहती है कि प्रदेश के युवा आधुनिक विषयों के साथ-साथ भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का भी अध्ययन करें और उस पर शोध कर वैश्विक स्तर पर नई पहचान स्थापित करें. उन्होंने बताया कि शोधपीठों के माध्यम से वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, जैन और बौद्ध दर्शन, आयुर्वेद, योग, भारतीय गणित, खगोल विज्ञान, स्थापत्य कला, कृषि विज्ञान, पर्यावरण संरक्षण सहित भारतीय ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न आयामों पर गंभीर और गुणवत्तापूर्ण शोध कराया जाएगा. पीएचडी, पोस्ट-डॉक्टरेट तथा स्नातक और परास्नातक स्तर के शोधार्थियों को भी शोध अनुदान और अकादमिक सहायता उपलब्ध कराई जाएगी.
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मंत्री ने कहा कि सरकार द्वारा दी जाने वाली दो करोड़ रुपये की अनुदान राशि सावधि जमा (एफडी) के रूप में सुरक्षित रखी जाएगी. इससे मिलने वाले ब्याज से शोधपीठ का नियमित संचालन, शोध परियोजनाएं, अकादमिक गतिविधियां और अन्य कार्यक्रम संचालित किए जाएंगे. इसके अलावा कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR), दान और अन्य वैधानिक स्रोतों से भी संसाधन जुटाने की अनुमति होगी. पांच वर्ष पूरे होने के बाद शोधपीठों के कार्यों की समीक्षा कर आगे की रणनीति तय की जाएगी.
योजना के तहत दुर्लभ पांडुलिपियों और प्राचीन ग्रंथों का डिजिटलीकरण किया जाएगा. शोध पुस्तकों, अनुवादों और समीक्षात्मक संस्करणों का अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप प्रकाशन होगा. साथ ही शोध सामग्री को ओपन-एक्सेस डिजिटल लाइब्रेरी और मूक्स प्लेटफॉर्म के माध्यम से देश-दुनिया के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं तक उपलब्ध कराया जाएगा. योजना के संचालन के लिए प्रत्येक संस्थान में कुलपति अथवा प्राचार्य की अध्यक्षता में संचालन समिति गठित की जाएगी, जिसमें विषय विशेषज्ञ, वित्त अधिकारी और बाह्य विशेषज्ञ शामिल होंगे. वहीं, निदेशक उच्च शिक्षा, प्रयागराज की अध्यक्षता में गठित पांच सदस्यीय समिति सभी प्रस्तावों की जांच कर शासन को अपनी संस्तुति देगी. स्वीकृति के बाद ही बजट जारी किया जाएगा. यदि किसी संस्थान द्वारा धनराशि का दुरुपयोग किया जाता है या दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया जाता, तो शासन को पूरा अनुदान वापस लेने का अधिकार होगा.


