अभय मिश्रा, मऊगंज। मध्य प्रदेश के मऊगंज में बारिश के बाद तबाही का मंजर दिखाई दिया। आपदा प्रबंधन और बचाव के दावे की हकीकत मऊगंज जिले के नईगढ़ी की सड़कों पर बिखरी पड़ी है। बाढ़ का पानी तो धीरे-धीरे उतर गया है, लेकिन अपने पीछे बर्बादी के ऐसे निशान छोड़ गया है जिन्हें देखकर किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह कांप जाए।
लगभग 200 से ज्यादा घर ज़मींदोज़ हो चुके हैं, अनाज सड़ चुका है, बच्चों की किताबें मलबे में तब्दील हो चुकी हैं और इंसान खुले आसमान के नीचे सड़क पर चूल्हा जलाने को मजबूर है।मौहरिया गांव के हरिजन और आदिवासी टोले में हालात ऐसे हैं कि करीब डेढ़ सौ से ज्यादा लोग दाने-दाने को मोहताज हैं। 8 से ज्यादा मकान ताश के पत्तों की तरह ढह गए। जिन हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, वो बच्चे अब मलबे से अपनी भीगी हुई कॉपियां ढूंढ रहे हैं। छत छिन चुकी है, गृहस्थी तबाह हो चुकी है और जिम्मेदार… अब भी सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ा रहे हैं।
सिस्टम की बेरुखी और लापरवाही का सबसे खौफनाक चेहरा अष्टभुजी मंदिर के पास देखने को मिला। जहां बिहार का रहने वाला मजदूर आकाश पानी के तेज बहाव में फंस गया। चश्मदीदों के मुताबिक, आकाश दो घंटे तक एक पत्थर को पकड़कर जिंदगी की भीख मांगता रहा, चीखता रहा… लेकिन वक्त पर न राहत पहुंची, न बचाव टीम! नतीजा? उफनती लहरें उसे बहा ले गईं। जब रीवा संभाग के कमिश्नर सैलेंद्र सिंह जन विश्वास शिविर में पहुंचे, तो मीडिया ने इस नाकामी पर सवाल दागे। लेकिन प्रशासनिक जवाब में संवेदनहीनता की बू साफ नजर आई। उन्होंने कहा कि हमारी आपदा प्रबंधन (Disaster Management) की टीम लगातार काम कर रही है और प्रभावित क्षेत्रों पर नजर बनाए हुए है।
कमिश्नर टीम के काम करने का दावा कर रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि आपदा बीत जाने के दो दिन बाद मऊगंज एसडीएम को पटवारी और तहसीलदार की याद आई और सर्वे के आदेश जारी हुए। प्रशासनिक सुस्ती से परे, ग्रामीणों का सबसे बड़ा गुस्सा अपने स्थानीय विधायक पर फूटा है। जनता का आरोप है कि बाढ़ की तबाही के बाद भी विधायक ने मौके पर जाकर पीड़ितों का हाल भी नहीं जाना।
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