शिखिल ब्यौहार, भोपाल। मध्यप्रदेश में हाल ही में बीजेपी विधायक प्रीतम सिंह लोधी द्वारा एक IPS अधिकारी को धमकी देने की घटना को लेकर पीसीसी चीफ जीतू पटवारी ने पुलिस की भूमिका और कार्यशैली पर बड़ा सवाल उठाया है। मामले को लेकर उन्होंने एमपी पुलिस को पत्र लिखा है। उन्होंने लिखा- घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यह केवल एक व्यक्ति की भाषा या व्यवहार का मामला नहीं है, बल्कि यह उस खतरनाक माहौल का संकेत है जिसमें सत्ता का अहंकार कानून और संविधान पर हावी होता जा रहा है।
पुलिस तंत्र की प्रतिक्रिया अक्सर बेहद सीमित, संयमित
मैं यह पत्र केवल एक घटना के संदर्भ में नहीं, बल्कि उस व्यापक स्थिति को ध्यान में रखते हुए लिख रहा हूं, जिसमें बार-बार ऐसे प्रसंग सामने आते हैं जहां BJP नेता खुलेआम पुलिस अधिकारियों को डराने, दबाव बनाने या अपमानित करने का प्रयास करते हैं। उससे भी ज्यादा चिंताजनक यह है कि इन घटनाओं के बाद पुलिस तंत्र की प्रतिक्रिया अक्सर बेहद सीमित, संयमित और कभी-कभी मौन ही रह जाती है।
तब आपकी आवाज धीमी क्यों पड़ जाती
मेरा पुलिस अधिकारियों से एक सीधा सवाल है कि आखिर वह कौन-सी परिस्थितियां हैं, जिन्होंने देश के सबसे प्रशिक्षित, अनुशासित और साहसी अधिकारियों को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है? जब अन्याय के खिलाफ दहाड़ने की जरूरत होती है, तब आपकी आवाज धीमी क्यों पड़ जाती है? और जब आम नागरिक सामने होता है, तब वही तंत्र इतना कठोर और आक्रामक कैसे हो जाता है?
क्या यह सच नहीं है कि जब पुलिस निष्पक्ष और संविधान के दायरे में रहकर काम करती है, तब किसी भी नेता या प्रभावशाली व्यक्ति की हिम्मत नहीं होती कि वह उसे आंख दिखा सके? लेकिन जब वही पुलिस बीजेपी सरकार के अनैतिक कार्यों की संरक्षक बनती हुई दिखाई देती है, तब उसे दबाव भी झेलना पड़ता है और अपमान भी सहना पड़ता है।
पत्र में आक्रोश कम और विवशता ज्यादा
मैंने IPS एसोसिएशन का पत्र भी पढ़ा। उस पत्र में आक्रोश कम और विवशता ज्यादा नजर आती है। यह एक मजबूत और स्वाभिमानी संस्था की आवाज नहीं, बल्कि एक ऐसे तंत्र की अपील प्रतीत होती है जो भीतर से दबाव में है। यह स्थिति केवल पुलिस के लिए नहीं, पूरे लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। क्योंकि यदि कानून लागू करने वाली संस्था ही असहाय दिखेगी, तो आम नागरिक का विश्वास किस पर टिकेगा?
संविधान को संरक्षक मानिए, न कि सत्ता को
मैं यह भी स्पष्ट करना चाहता हूं कि यह पत्र पुलिसकर्मियों के खिलाफ नहीं है। देश के लाखों पुलिसकर्मी दिन-रात अपनी जान जोखिम में डालकर काम करते हैं, और उनकी कर्मठता और साहस को पूरा देश सलाम करता है। यह पत्र उन परिस्थितियों के खिलाफ है, जो आपको आपकी मूल भूमिका से दूर कर रही हैं। इसलिए आपसे आग्रह है कि अपने भीतर के उस साहस को याद कीजिए, जिसके कारण आपने यह वर्दी पहनी थी। संविधान को अपना सबसे बड़ा संरक्षक मानिए, न कि किसी सरकार या व्यक्ति को। अन्याय चाहे किसी भी पक्ष से हो, उसके खिलाफ आवाज उठाना ही आपकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
आप अपनी आवाज खुद बनें
यदि पुलिस ही डर जाएगी, यदि पुलिस ही चुप हो जाएगी, तो कानून का राज केवल एक कल्पना बनकर रह जाएगा। समय आ गया है कि आप अपनी आवाज खुद बनें। क्योंकि जब कानून की रक्षा करने वाले ही खामोश हो जाते हैं, तब अन्याय बोलने लगता है। आशा है आप इस संदेश को एक आलोचना नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक की चिंता और अपेक्षा के रूप में देखेंगे।

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