जीवन सूक्त : वास्तविक रूपांतरण का एक ही समीकरण है चुपचाप स्वयं को बदलना। “Be the change you wish to see in the world.” इसका मतलब है दुनिया में आप जो बदलाव देखना चाहते हैं उसकी शुरुआत स्वयं से कीजिए। जीवन दर्शन शब्दों से नहीं बल्कि हमारे आचरण, विचारों और परिवर्तन से मिलता है। जब तक स्वयं की क्षमताओं और आत्मसम्मान को गंभीरता से न लिया जाए तब तक समाज भी उसे गम्भीरता से नही लेता।
कुछ शिकायत और समस्या आम है जैसे कुछ लोग आपको समझ नहीं रहे, कुछ ने आपका साथ छोड़ दिया है और कुछ आपकी हँसी उड़ाते हैं। कई बार लोग आपकी कीमत बहुत देर बाद समझ पाते हैं। आपको सिर्फ़ एक ही काम करना है अपनी योग्यता का प्रमाण उन लोगों को देने में समय नष्ट मत कीजिए, जिसमें आपको समझने की क़ाबिलियत ही ना हो। ऐसे लोगों के बीच अपनापन, सुविधा, प्रेम और भरोसा तलाशने में अपनी शक्ति और समय न गवाएँ।
दूसरों को मनाने, समझाने और राज़ी करने में लगाई गई ऊर्जा यदि स्वयं को निखारने में लगा दी जाए तो जीवन की दिशा बदल सकती है। आपकी भावनाएँ, आपकी संवेदना और आपकी चेतना सभी ऊर्जा के पिंड हैं उसे अपनी शक्ति बनाइए और अपने ऊपर खर्च कीजिए। इस लेख के साथ आज ही सुबह से आपको बहुत कुछ करना है सबसे पहले स्वयं को बदलने के लिए अपनी सोच को सकारात्मक बनाना है, चाल नहीं, चरित्र को श्रेष्ठ बनाना है, चेहरा नहीं, चेतना को जागृत करना है।लिखी गई यह अँग्रेज़ी की पंक्ति भी सत्य है “The best way out is always through.” इसका अर्थ है कठिनाइयों से बचने के बजाय उनका सामना करके ही आगे बढ़ने का रास्ता मिलता है।
स्वयं को चुपचाप बदलने का हुनर प्रकृति से बेहतर और कोई नही सीखा सकता। हमें जैसे बीज बिना शोर किए वृक्ष बन जाता है, सूरज बिना घोषणा किए संसार को प्रकाश देता है और नदी निरंतर बहकर सागर तक पहुँच जाती है। इसी तरह अपने लक्ष्य को ध्यान में रखिए, समय का सदुपयोग कीजिए और प्रतिदिन स्वयं का बेहतर बनाइए। “Great things are done by a series of small things brought together.” इस अँग्रेज़ी कहावत का अर्थ है बहुत से छोटे-छोटे प्रयास मिलकर एक बड़ी उपलब्धियों का निर्माण करते हैं। आपके सफलता की जानकारी आपकी घोषणा से ना हो बल्कि आपका बढ़ा हुआ क़द और आपका निखरा हुआ व्यक्तित्व इस बात का परिचय दे तो बेहतर है। मुख को मौन रखिए, कर्म को मुखरित होने दीजिए।
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। कठोपनिषद् के इस श्लोक का अर्थ है उठो, जागो, श्रेष्ठ मार्गदर्शन प्राप्त करो और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयत्न करो। स्वयं को बदलने के लिए समाज की स्वीकृति नही, आत्मबल की आवश्यकता होती है। बस इतना स्मरण रखिए बीज से वृक्ष बनने के सफ़र में बीज का कोई सहयोगी नही होता। बीज अपना संघर्ष बिना किसी के सहयोग से करता है।

संदीप अखिल
सलाहकार संपादक
न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम
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